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MANOJ K. JHA | 14 NOVEMBER, 2017

हिन्द के जवाहर के नाम एक ख़त जहाँ ‘गरम हवा’ का बेमुरव्वत मौसम बदल ही नहीं रहा

हिन्द के जवाहर के नाम एक ख़त जहाँ ‘गरम हवा’ का बेमुरव्वत मौसम बदल ही नहीं रहा


प्रिय जवाहरलालजी

सादर प्रणाम!



मैं उन करोड़ों लोगों में शुमार हूँ जो आपको सालगिरह की मुबारकवाद कह रहा है..उस हिंदुस्तान से जिससे आपने बेपनाह मुहब्बत की और जिसने भी आपको प्यार देने में कोई कोताही नहीं बरती. आपकी 125 वीं जयंती पर आपको एक ख़त लिखा था और आपके प्यारे मुल्क के सुरत-ए—हाल का थोड़ा ज़िक्र किया था. मैंने आपसे कहा था जिस ‘गरम हवा’ को आपने और आपके साथियों नेस्तनाबूद कर दिया था वो ‘लू’ बनकर वापस आ रही है. खैर उस ख़त की आखिर में मैंने वादा किया था कि यदि हालात में बेहतरी होगी तो आपको फिर नहीं लिखूंगा. लेकिन मेरी उम्मीद के ठीक विपरीत वो लू और गरम हवा अब और परेशान कर रही है इसलिए मैं इसे फिर से आपको लिखने के लिए बैठा हूँ..आपके आराम में खलल के लिए मुआफी के साथ!

इससे पहले कि आप चौंके मैं आपसे कुछ बाते बिना लाग लपेट के कह देना चाहता हूँ.मेरा परिचय आपके लिए कुछ खास महत्व नहीं रखता है. मैं आपकी मृत्यु के तीन वर्ष पश्चात उस धरती पर आया था जिसकी ज़मीन में आपका अस्थिअवशेष समाहृत हो चूका था. आप चल बसे थे लेकिन आपकी मौजूदगी मेरी पीढ़ी के इर्दगिर्द हमेशा बनी रही. बचपन से ही सुनता रहा था. नेहरु ने ये किया...नेहरु ने वो किया... ये बाँध...ये बराज नेहरु ने बनवाया था........इस विश्वविद्यालय की नीव नेहरु ने रखी.

ये नीति नेहरु ने बनाई.... इतने विशाल और विविधता से भरे मुल्क में उदार लोकतंत्र और हर व्यक्ति को वोट का अधिकार देने में नेहरु की महती भूमिका रही...आदि. हमारे गाँव में एक मिलन मंदिर हुआ करता था(जिसके मैंने सिर्फ भग्नावशेष देखे थे).लोग बताते थे कि आपके द्वारा शुरू किये गए ‘सामुदायिक विकास कार्यक्रम’ के तहत ये बना था. मेरे दादा बताते थे कि नाम में मंदिर शब्द होने के बावजूद किसी का प्रवेश प्रतिबंधित नहीं था —न जाति नाही वर्ग या भिन्न पूजा पद्धति के आधार पर. शायद आपक जैसों के कारण उस दौर में मंदिर को मस्जिद से और मस्जिद को मंदिर से खतरा नहीं था.

कमाल है जवाहरलाल जी!आप ये सब कर गए और पीछे छोड़ गए ये कहानियाँ जिनको सुनकर और पढ़कर मेरी पूरी पीढ़ी को एक कमी का एहसास होता रहा.....हमने हजारो दफे ये सोचा कि काश आपके रहते ही हम भी पृथ्वी पर आ गए होते तो ‘स्वर्गीय इन्दर मल्होत्राजी’ की तरह हम भी कहते कि, ‘हिंदुस्तान दुनिया की सबसे खास जगह है क्योंकि यहाँ नेहरू रहते थे.आजादी की हीरक जयंती पर पैदा हुए बच्चे भले कितने ही बरस जिए लेकिन वो नेहरु की तरह के ज़िंदादिल और उदार शख्स को कभी नहीं देख पाएंगे.

खैर! इस ख़त को लिखने का आशय यह नहीं था कि आपकी तारीफ में कसीदे काढ़े जाएँ.... जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि हाल के दिनों में हमारे मुल्क में एक बार फिर से तकसीम के वक़्त वाली गरम हवा चल पड़ी है... गरम हवा क्या कहें बल्कि लू है! अब तकसीम किसी ‘वाघा बॉर्डर’ या रेडक्लिफ लाइन जैसा नहीं है—दूर कहींएक सीमा पर ! बल्कि हर मोहल्ले, गाँव, शहर में बंटवारे की लाइन खींची जा रही है. ये लाइनें दिखती नहीं है लेकिन चुभती बहुत है. इसने आपके मुल्क के दिल में इतने छेद कर दिए हैं कि कोई भी उपचार लाचार सा हो जा रहा है.

लोकतंत्र की सारी प्रक्रियाओं और संस्थाओं पर इस ‘लू’ का असर पड़ रहा है. यहाँ तक कि इतिहास की समझ से मीलों दूर वाले नेतागण इतिहासकार बनकर आपको आपके प्रिय साथी सरदार पटेल से लड़वाने में लगे हुए हैं.इन लोगों का मानना है कि बापू ने आपको अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देश के नाइंसाफी कर दी थी.इनकी कार्यशैली एक खतरनाक डिजाईन को जन्म दे रही है जो इस प्यारे मुल्क की सामूहिक स्मृति का क़त्ल कर रही है.

हमें पता है कि सन 36 में लखनऊ कांग्रेस के बाद दो अलग-अलग समूहों के बीच स्पष्ट मतभेद थे। आप 'समाजवादी ब्लॉक' के करीब माने जाते थे, दूसरी तरफ थे राजाजी, राजेन्द्र बाबू और सरदार पटेल जैसे नेतागण.दोनों समूह ने बापू को पत्र लिखा और हमेशा की तरह उन्होंने प्रत्येक को जवाब दिया और मतभेदों को हल किया। मैं आपको बापू द्वारा लिखे गए पत्र से कुछ लाइनें साझा करना चाहूंगा, जो आपके पत्र के जवाब में है:

“प्रिय जवाहर! तुम्हारा पत्र मुझे छू गया. मैं मानता हूँ कि तुम्हारे सहकर्मियों में तुम्हारी वाली हिम्मत और स्पष्टता की कमी है। और इसका परिणाम विनाशकारी रहा है.मैंने हमेशा उनसे अनुरोध किया है कि वे तुमसे खुले तौर पर स्पष्ट बात करें। लेकिन खुलेपन के आभाव में उन्होंने ऐसा नहीं किया और माहौल को ख़राब ही किया और तुम परेशान होते हो. मैं तुमसे आग्रह करता हूँ कि समिति की बैठकों में अपने हास्य-विनोद वाले स्वाभाव को फिर से बहाल करो यह तुम्हारे स्वाभाव का सबसे सुखद पहलू है.कितना बेहतर होगा कि मेरा पत्र ख़त्म करने के बाद तुम तिरंगे के साथ वैसा ही नृत्य करो जैसा लोग बताते हैं कि तुमने नए साल के अवसर पर लाहौर में किया था।“

प्रिय जवाहरलाल जी! हमारी राजनीति में इनदिनों उन लोगों का प्रभुत्व है, जिन्होंने स्वयं को 'काल्पनिक और प्रतिवादी' इतिहासकार घोषित कर दिया है और वे हमारे इतिहास को प्रतिगामी विचारों और विचारधाराओं के अलोक में फिर से लिखना चाहते हैं। अपनी संकीर्ण राजनितिक सरोकारों की खातिर ये स्वाधीनता संग्राम के आपके कद्दावर साथियों के मध्य मतभेद/मनभेद की कपोल गाथाएं बांच रहें हैं. इन राजनेता-सह-स्वयभू इतिहासकारों को इतनी समझ नहीं है कि सन 16 के गाँधी की सोच और सन 42 वाले गाँधी भी एक से नहीं थे. इन्हें कौन बताये कि बारडोली के सत्याग्रह वाले सरदार पटेल और दांडी मार्च वाले पटेल की सोच में भी स्पष्ट अंतर थे। हमने हमेशा यह जाना कि ऐसे स्वाभाविक मतभेदों ने न तो इतिहास या इतिहासकारों को कभी भी उत्तेजित किया.

मुझे मशहूर पेंटर अमृता शेरगिल से जुड़ा आपका एक वाकया सुनाने को दिल कर रहा है. आपने उन्हें अपनी आत्मकथा की प्रति भेजी जिसके जवाब में उन्होंने अपने ज़बरदस्त अंदाज़ ममें लिखा, “मैंने आत्मकथाओं को कभी पसंद नहीं किया है.. मुझे उनमें आडंबर और स्व-प्रदर्शन होता है...लेकिन मुझे लगता है कि मैं आपका पढूंगी. (क्योंकि) आप वैसे हैं जो ये कहता हैं कि 'जब मैंने पहली बार समुद्र देखा', और अधिकतर आत्मकथा लिखने वाले कहते हैं 'जब समुद्र ने पहली बार मुझे देखा' अमृता शेरगिल ने महज़ इन पंक्तियों में ‘हिन्द के जवाहर’ को परिभाषित कर दिया.

जवाहरलाल जी! आपके लिए भले ही धर्मनिरपेक्षता न्याय, समानता और लोकतंत्र के लिए आपकी प्रतिबद्धता की एक महत्वपूर्ण कड़ी थी लेकिन आज के शासकगण और उनकी विचारधारा के झंडाबरदार मानते हैं भारत जैसा महान और असीम संभावनाओं वाल देश सिर्फ इसी कारण ‘सोने कि चिड़िया’ के स्तर से पदच्युत हो गया कि आपने इसे धर्मनिरपेक्ष देश बना दिया.आपके पश्चात ये आपकी विचारधारा वालों को धर्मनिरपेक्षता से पहले ‘छद्म’ उपसर्ग लगाकर नवाजने लगे’.कमाल तो यह है जवाहरलालजी कि आपके मूर्तिभंजक इस बात को नहीं मान पाते हैं कि आपकी धर्मनिरपेक्षता की समझ पश्चिमी देशों से आयातित नहीं थी.

बौनी समझ और संकीर्ण दायरे वालों को कैसे बताएं कि आपकी धर्मनिरपेक्षता की जड़ें हिंदुस्तान के धार्मिक सन्दर्भ,राजनीतिक चिंतन और संस्कृतिक अवधारणाओं के मध्य सिंचित हुई थीं. आपके लिए, धर्मनिरपेक्षता बस एक राजनीतिक दर्शन नहीं था, बल्कि एक व्यापक और मानक संकल्पना थी जिसमे सभी धर्मों, मान्यताओं और समुदायों को पूरी स्वतंत्रता के साथ जिंदगी जीने और राष्ट्रनिर्माण में हिस्सेदारी की आज़ादी थी. ये कैसे इस बात को माने कि तमाम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बाधाओं के बावजूद सभी के लिए सामान अवसर की राज्य की प्रतिबद्धता सुनिश्चित करना आसान नहीं था जबकि पड़ोस में हालिया पाकिस्तान बना हो.

ऐसे समाज में जहाँ जातिगत जन्म सुविधाओं की उपलब्धता या अनुपलब्धता तय करता हो वहां एक व्यक्ति, एक मत और एक मूल्य की वकालत करना और उसे मुकम्मल अंजाम तक ले जाना आज के चौड़े सीने वाले नेता लोग क्या समझेंगे? आपने लिखकर, बार बार बोलकर ना सिर्फ अपने साथियों बल्कि इस पुरे मुल्क को बताया हमारी सभ्यता ने हमेशा बड़ा दिल रखा-कई धर्म और मजहबों के काफिले आते गए और यह खूबसूरत कारवां बनता गया. आप इस देश के चरित्र से वाकिफ थे जो कभी भी एकरंगा नहीं रहा था. आज जो एक वहशीपने की सोच हावी हो रही ये उस दौर में भी थी और आप लगातार लोगों को एकजुट होकर इस वहशीपने से लड़ने को कहते रहे और काफी हद तक सफल भी रहे. आप कहते रहे कि सांप्रदायिक उन्माद ने भारत के दिल को काफी हद तक तोड़ दिया है लेकिन सनातनी एका और साझी तहज़ीब की डोर पूरी तरह नहीं टूटी है.

बापू की हत्या से ठीक दो दिन पहले आपने श्यामा प्रसाद मुखर्जीजी को पत्र लिखकर हिंदू महासभा की नापाक गतिविधियों के बारे में अपनी चिंताओं को साझा करने के साथ साथ आरएसएस की भड़काऊ सांप्रदायिक तेवर के कारण भारत के विभिन्न हिस्सों में हो रहे दंगों का भी ज़िक्र किया था. अब आपको क्या बताऊँ कि बापू की हत्या वाला मामला फिर से खोला जा रहा है. मुझे खौफ है कि कहीं ये ना कह दिया जाए कि उनकी हत्या ही नहीं हुई थी? कहीं ये ना बताया जाए कि आपकी और आपके गृह मंत्री की भूमिका संदिग्ध थी? कुछ भी हो सकता है जवाहरलाल जी क्योंकि सत्यातीत काल का ‘दौरे सियासत है’ और यहाँ हर चिराग भयावह अँधेरे से खौफ खा रहा है.

आपको याद होगा आपके वक्त और खास तौर पर बंटवारे के बाद आपके ही कई सहकर्मी मुसलमानों से हिंदुस्तान के प्रति वफादारी का सबूत मांगते थे. हर उस ‘वफादारी’ का सबूत मांगने वालों के कारण आपका दिल रोया ज़रूर होगा लेकिन आपने हार नहीं मानी और न ही अपनी संवेदनाओं के साथ समझौता किया बल्कि कई कदम आगे जाकर आपने अपने सरोकारों को एक आन्दोलन का भी स्वरुप दिया.

कई वैसे लोग जो आपके दल में नहीं थे, वो भी आपके साथ आये क्योंकि उदार लोकतंत्र, समानता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर आधारित हिंदुस्तान के लिए एक व्यापक सहमति बन चुकी थी और कम से कम तब की तारीख़ शायद उलटे कदम चलने की इजाज़त नहीं देती थी.लेकिन अबके गरम हवा वाले वफादारी का सबूत नहीं मांगते सीधे तय कर देते हैं कि इसे फलाने मुल्क भेज दो. अब वालों ने शाम छह बजे से रात दस बजे तक चलने वाली नुमाईश वाली टीवी बहसों के माध्यम से ये तय कर दिया है कि कोई भी चाहे वो किसी कौम का है अगर इस ‘गरम हवा’ वाली राजनीति से इत्तेफ़ाक नहीं रखता वो सब ‘राष्ट्र विरोधी’ हैं.आपके मुल्क में सच को सच कहना मुश्किल होता जा रहा है.

जवाहरलालजी! कितनी बातें कहीं जाए आपसे और वो भी एकाध चिट्ठी में.पूरी दुनिया और तमाम समावेशी और एकान्तिक विचारों का गंभीरता से अध्यन करने के पश्चात आपको हिंदुस्तान के लिए लोकतान्त्रिक समाजवाद से बेहतर कुछ नहीं लगा.हालांकि यह समझता हूँ कि आपके लिए लोकतान्त्रिक समाजवाद की लड़ाई धर्मनिरेपक्षता की लड़ाई जितनी ही दुरूह थी. आपको याद हो उद्योगपतियों के कुछ बड़े समूहों ने तो आपके समाजवादी तेवर के कारण कांग्रेस को चंदा बंद कर देने तक की धमकी दे दी थी.लेकिन बिना भय के आप कांग्रेस को यह मनवाने में सफल हुए कि लोकतान्त्रिक समाजवाद सिर्फ राज्य का सरोकार ना होकर हर हिन्दुस्तानी की जीवन पद्धति का हिस्सा होना चाहिए.

संसदीय लोकतंत्र की मजबूती को लेकर आप अम्बेदकर साहेब से सहमत थे कि जब तक आर्थिक एवं सामाजिक बराबरी के मसले हल नहीं होंगे लोकतंत्र सिर्फ एक सीमित ‘प्रभु वर्ग’ का तंत्र बनकर रह जाएगा. शायद इसी तकाजे से लम्बी बहस के बाद 1954 के दिसंबर महीने में भारतीय संसद ने भी ‘समाज के समाजवादी ढांचे’पर मुहर लगा दी थी. और देखिये इस से ज्यादा दुर्भायपूर्ण क्या बात होती कि आपकी ही पार्टी ने सन 1991 के बाद आपके समाजवादी दर्शन का दानवीकरण शुरू कर दिया. अर्थव्यवस्था में बाज़ार नए भगवान् के रूप में अवतरित हुआ और लोग हमें बताने लगे कि आपकी गरीब-परस्त नीतियों के कारण हिंदुस्तान पूँजी की चमक से वंचित रह गया.वो आपके ही लोग थे जिन्होंने एक ‘व्यापक सहमति’ के आधार पर आपके लोकतान्त्रिक समाजवाद को अभियुक्त बनाना शुरू कर दिया और रही सही इस ‘गरम-हवा वाली पूंजीवाद’ ने पूरी कर दी.

आखिर में पेशे-नज़र मखदूम मोहिउद्दीन साहेब की वो बात जो उन्होंने आपके जाने के बाद आपके लिए कही थी.

हज़ार रंग मिले, इक सुबू की गरदिश में
हज़ार पैरहन आए गए ज़माने में
मगर वो संदल-ओ-गुल का गुबार, मुश्ते बहार
हुआ है वादिए जन्नत निशाँ में आवारा
अज़ल के हाथ से छूटा हुआ हयात का तीर
वो शश जेहत का असीर
निकल गया है बहुत दूर जुस्तजू बनकर


जय हिन्द
मनोज


(Manoj K. Jha is Professor in Delhi University)

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