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शरद कोकास | 5 FEBRUARY, 2018

मुक्तिबोध फिर फिर याद आते हैं

मुक्तिबोध का राजनांदगांव शहर ‘आधुनिक ‘ हो गया है ।


दिग्विजय महाविद्यालय राजनांदगांव के परिसर में प्रवेश करते ही किसी पुराने महल में आने का आभास होता है । किसी ज़माने में यह राज महल हुआ करता था जिसे बाद में महाविद्यालय में तब्दील कर दिया गया । इसी महाविद्यालय में गजानन माधव मुक्तिबोध अपने अंतिम दिनों में शिक्षक के रूप में आये थे । उन्हें रहने का ठिकाना मिला था महाविद्यालय के आख़िरी दरवाज़े के ऊपर बने एक कमरे में जहाँ रहकर उन्होंने अपनी बेहतरीन रचनाएँ लिखीं ।

हालनुमा इस इस कमरे में जो कि किसी समय मुक्तिबोध का निवास था प्रवेश करने के लिए बगल से सीढियाँ हैं जो इस लम्बे हाल के बीचोबीच जाकर खुलती हैं । यह कमरा एक लम्बे गलियारे की तरह है जिसमे पांच बड़ी बड़ी खिड़कियाँ हैं । खिड़कियाँ खुलते ही बाहर की ओर रानी तालाब दिखाई देता है जिसके किनारे विशाल दरख़्त हैं । पेड़ों के आगे तालाब का विस्तार है जिसमे अथाह जल राशि है । जब चाँद निकलता है तो उसकी रौशनी खिडकियों से भीतर आती है .. इस चाँद को देखकर ही मुक्तिबोध ने लिखा होगा "टेढ़े मुँह चाँद की ऐयारी रौशनी भी खूब है / लोहे के गजों वाली जाली के झरोखों के इस पार / लिपे हुए कमरे में / काली काली धारियों के पीले पीले बड़े बड़े चौकोन .. जेल के कपड़े सी फैली है चांदनी / उसी वक्त अन्धियाले ताल पर / काले घिने पंखों की बार बार लहरों के मंडराते विस्तार.."

 


मैं उसी खिड़की के किनारे बैठा हूँ । इतनी जगह यहाँ है कि यहाँ बैठकर बाहर का दृश्य देखा जा सकता है । मुक्तिबोध यहीं कहीं बैठते होंगे । उनकी कविताओं के पन्ने यहीं कहीं बिखरे रहते होंगे । अब मैं खिड़की से हटकर कमरे के बीच वाले हिस्से में आ गया हूँ .. अरे यहाँ तो वही चक्करदार सीढ़ी है जो मुक्तिबोध की कविताओं में बार बार आती है .. "मैं उन सीढ़ियों पर चढ़ता हूँ .. ज़िंदगी के अँधेरे कमरों में /अँधेरे लगाता है चक्कर /कोई एक /लगातार आवाज़ पैरों की देती है सुनाई /बार बार ... बार बार /वह नहीं दीखता /नहीं ही दीखता /किन्तु वह रहा घूम .."

मुझे भी मुक्तिबोध कहीं नहीं दिखाई देते । लेकिन वे ऐसे ही घूमती हुई इन चक्करदार सीढ़ियों पर चढ़ते होंगे । मैं भी उन सीढ़ियों पर चढ़कर ऊपर पहुँचता हूँ .. ऊपर छत है जिस पर मुंडेर है । मैं उस पर चढ़कर नीचे की ओर देखता हूँ..सामने वही बावड़ी है " बावडी को घेर / डालें खूब उलझी हैं / खड़े हैं मौन औदुम्बुर / व शाखों पर .." मैं उन शाखों पर लटकते घुघ्घुओं के घोसले देखना चाहता हूँ लेकिन वे मुझे नहीं दिखाई देते । एक सूखा हुआ पेड़ अलबत्ता मुझे दिखाई देता है ।

 


दाहिनी और बूढ़े तालाब का विस्तार है जहाँ आजकल मछुआरों ने अपनी बस्ती बसा ली है और उनके जाल वहाँ सूख रहे हैं । वहाँ अब 'जंगली हरी कच्ची गंध' नहीं आती वहाँ सिर्फ मछलियों की गंध है । दूर दूर तक जल का विस्तार है । मैं उस विस्तार के भीतर देखना चाहता हूँ लेकिन मुझे वह तिलिस्मी खोह भी नहीं दिखाई देती । झील के उस पार अब कुछ इमारतें बन गई हैं जो यकीनन मुक्तिबोध के समय वहाँ नहीं रही होंगी । मुक्तिबोध के राजनांदगांव शहर का आधुनिकीकरण हो गया है ।

इमारत की इस उंचाई पर पहुँचकर मैं नीचे झांकता हूँ .. मुझे फिर मुक्तिबोध याद आते हैं /.... "अरे भाई मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा / मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से " मैं एक बार नीचे की ओर झांककर देखता हुआ अपने कदम पीछे खींच लेता हूँ और सीढ़ियों से उतरकर नीचे कमरे में आ जाता हूँ । सीढ़ियों से उतरते हुए जाने कितनी दिशाओं में घूम जाता हूँ मैं जैसे घूम घाम कर फिर मैं अपने ही सामने खड़ा हो गया हूँ ।

 


मुक्तिबोध के इस कमरे में अब पक्की चमकदार टाइल्स लगी हैं ..वह ज़मीन जिसे लीप कर रहने लायक बनाया जाता था अब नहीं है । कमरे के बीच खड़े हुए मैं सोचता हूँ मुक्तिबोध की टेबल कहाँ रखी रहती होगी और वह कुर्सी जिस पर बैठकर वे कविता लिखते होंगे कहाँ होगी और उनका पलंग कहाँ रखा रहता होगा और कहाँ उनकी रसोई होगी जहाँ आई अपने बच्चों के लिए खाना पकाती होगी । सोचता हूँ कि अगली बार आऊंगा तो उनके बेटे दिवाकर मुक्तिबोध को साथ लेकर आऊंगा और उनसे पूछूँगा कि वे कहाँ सोते थे ।

अभी पिछले दिनों ही तो उनके बड़े बेटे रमेश मुक्तिबोध मिले थे.. बता रहे थे कि अपने अंतिम दिनों में मुक्तिबोध ने उनसे कहा था कि बस उन्हें पांच साल और चाहिए ताकि वे अपना बचा हुआ काम पूरा कर सकें, लेकिन नियति ने उन्हें पांच साल क्या पांच सप्ताह भी नहीं दिए ।

 


मैं पूरे हाल में झांककर देखता हूँ । इन कमरों में अब सिर्फ मुक्ति बोध नहीं हैं इसे तीन विभूतियों में बाँट दिया गया है । मुक्तिबोध वाले हिस्से में लकड़ी की एक टेबल रखी हैं जिस पर काँच जड़ा हुआ है और उसके भीतर मुक्तिबोध की हस्तलिपि में लिखी हुई कुछ रचनाएँ रखी हुई हैं । मैं काँच के ऊपर अपना मोबाइल रखता हूँ और उन रचनाओं को स्कैन कर लेता हूँ । ओह ..कितने पुराने हो गए हैं यह कागज़.. पचास साल से भी अधिक पुराने होंगे, अब इन्हें सहेज कर रखना ज़रूरी है । इनमें अब भी मुक्तिबोध के हाथों की गंध बसी होगी ।

फिर मेरी नज़र दीवारों पर जाती है । यहाँ श्वेत श्याम कुछ तस्वीरें हैं । एक में मुक्तिबोध हैं और दूसरी में उनका परिवार .. मुक्तिबोध की बीड़ी पीती हुई तस्वीर से अलग यह तस्वीरें है जिनमे मुक्तिबोध बहुत ही सौम्य व शांत दिखाई दे रहे हैं । इन्हें देखकर पता ही नहीं चलता कि इस व्यक्ति के भीतर कितना बड़ा तूफ़ान उमड़ता घुमड़ता था जो बार बार उन्हें कोंचता था ..." अरे मर गया देश जीवित रह गए तुम.."

मैं फिर अन्यमनस्क सा उसी खिड़की के पास पहुंचता हूँ । मुझे हवा में अचानक बीड़ी की गंध आती है और मैं उस कोने की ओर देखता हूँ जहाँ बीड़ी पीकर वे फेंक देते थे । बुझी हुई बीड़ियों के ठूंठ अब वहाँ नहीं हैं । मैं हाल के दूसरे हिस्से में जाता हूँ वहाँ भी अब मुक्तिबोध नहीं हैं । हाल के वे हिस्से अब बलदेव प्रसाद मिश्र और पदुमलाल पुन्नालाल बक्षी को सौंप दिए गए हैं । वहाँ भी ऐसे ही काँच से मढ़ी हुई टेबलों के भीतर उनकी रचनाएँ हैं ।

मैं मुक्तिबोध के घर से बाहर निकल आता हूँ । मछुआरों के जाल के क़रीब तीन आवक्ष प्रतिमाएँ हैं जिनमे एक मुक्तिबोध की भी है । जाने कितने महीनों पहले उन्हें किसी ने गेंदे का एक हार पहनाया था जो अब सूख चुका है । सोचता हूँ जब अगली बार आऊंगा तो एक हार लेता आऊंगा .. हम और कुछ न कर सकें एक हार तो उनकी प्रतिमा को पहना ही सकते हैं ।

न्यूज़ सरोवर


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