...जब एक कश्मीरी डॉक्टर ने देखी अपने बेटे की लाश

मुठभेड़ में घायलों का इलाज करते वक़्त पेश हुआ ऐसा मार्मिक दृश्य

Update: 2018-07-28 16:48 GMT

डॉ अब्दुल गनी पोशवाल और उनके परिवार के लिए 29 जून 2018 का दिन कयामत ढाहने वाला था. उनके 16 वर्षीय बेटे फैजान अहमद पोशवाल का शव उनके सामने अस्पताल के स्ट्रेचर पर पर पड़ा था. फैजान के कपड़े और स्ट्रेचर पूरी तरह से खून से सने थे. पुलवामा जिले के चातापोरा गांव में एक मुठभेड़ के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा दागी गयी गोलियों से उसका पूरा शरीर छलनी था.

डॉ पोशवाल ने कभी सपने में भी यह नहीं सोचा था कि उनके पास इमरजेंसी में लाये गये घायलों में से एक उनका बेटा भी होगा. फैजान अपने 15 वें जन्मदिन के दो महीने बाद और दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा से तीन महीने पहले मारा गया.

उस दिन को याद करते हुए डॉ पोशवाल बताते हैं, “वह एक उदासी भरा दिन था और बारिश के आसार थे. मैं भोर में उठा, सामान्य दिनचर्या के तहत पास की मस्जिद में सुबह का नमाज पढ़ा. मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि फैजान अबतक जगा नहीं था. वह शायद ही कभी सुबह का नमाज छोड़ता था. मैं फिर अपने घर से पांच मिनट की दूरी पर स्थित अस्पताल चला गया.”

फैजान की मां शाहीन कौसर ने बताया कि वह तकरीबन साढ़े ग्यारह उठा और जुमा के नमाज के लिए पम्पोर जाने के लिए झटपट तैयार हुआ. वह नाश्ता किये बगैर यह कहते हुए निकल गया कि नमाज के बाद दोपहर का खाना सबके साथ खायेगा. लेकिन वह नहीं लौटा.

डॉ पोशवाल ने बताया, “मैं जिला अस्पताल, पुलवामा में अपना काम निबटा रहा था, जब चातापोरा में मुठभेड़ की ख़बर आई. लगभग 30 मिनट के भीतर बंदूक और रबर की गोलियों से घायल लोगों को इलाज के लिए लाया जाने लगा. घायलों की बड़ी तादाद को देखते हुए मुझे फैजान की चिंता होने लगी और मैंने उसके सेलफोन पर फोन करके यह जानने की कोशिश की कि वह कहां है. लेकिन, उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. उसके बाद मैं घायलों के इलाज में व्यस्त हो गया, पर मेरा दिल फैजान के लिए चिंतित रहा. मैंने उसे दोबारा फोन करने का निर्णय लिया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. पांच या छह घायलों को देखने के बाद जब मैं लौट रहा था, तो मेरे फोन की घंटी बजी और मुझे तुरंत इमरजेंसी पहुंचने को कहा गया. ज्योंहि मैं वहां पहुंचा, मुझे यह अहसास हुआ कि कहीं कुछ गड़बड़ है. मेरे कई सहयोगी चिंतित नजर आ रहे थे और कई रो रहे थे. चिकित्सा अधीक्षक एवं कई अन्य लोग मेरे पास आये और मुझे दिलासा देने लगे जबकि मैं उनसे यह पूछने की कोशिश कर रहा था कि आखिर हुआ क्या है. तभी मेरी नजर आपरेशन थिएटर के बाहर खून से सने चादर में लिपटी मेरे बेटे की लाश पर पड़ी. फैजान ने मेरे साथ दगा किया. वह मुझे छोड़कर चला गया.”

फैजान के जनाजे की पहली नमाज उस अस्पताल परिसर में पढ़ी गयी, जहां उसने अपने बचपन का अधिकांश हिस्सा गुजारा था. नाराजगी भरे नारों और भारी बारिश के बीच उसकी लाश को दफ़नाने के लिए पम्पोर के गोसंनद – लुधोवन ले जाया गया जहां भारी तादाद में लोग उसके अंतिम संस्कार में शामिल हुए. ऐसी मुसलाधार बारिश पहले कभी नहीं हुई थी, ऐसा लग रहा था मानो आसमान भी किशोर फैजान अहमद पोशवाल के मौत का मातम में शरीक हो.

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