कश्मीरी पत्रकार की रिहाई के लिए सीपीजे ने राज्यपाल को पत्र लिखा

आसिफ सुल्तान को “गलत” ढंग से फंसाये जाने से सीपीजे नाराज

Update: 2019-01-17 15:03 GMT

जम्मू – कश्मीर राज्य प्रशासन के अधिकारियों पर कश्मीरी पत्रकार आसिफ सुल्तान को “दहशतगर्दी को बढ़ावा” देने का लांछन लगाकर “गलत” ढंग से फंसाये जाने का आरोप लगाते हुए कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) ने राज्यपाल सतपाल मालिक को पत्र लिखकर उक्त पत्रकार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई बंद करने एवं उन्हें तत्काल रिहा करने की मांग की है.

कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) के एशिया प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर स्टीवन बटलर ने राज्यपाल मालिक को भेजे गये अपने पत्र में लिखा, “उनके संपादक एवं परिवार ने इन दावों को सिरे से नकार दिया है और कहा है कि उनका काम सिर्फ एक पत्रकार के तौर पर समाचार संकलन तक ही सीमित था. इस संबंध में कोई आरोप – पत्र दाखिल नहीं किया गया है.”

उस पत्र में आगे कहा गया है, “प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र का एक अहम सिद्धांत है. हमारी आपसे गुज़ारिश है कि जम्मू – कश्मीर के राज्यपाल के तौर पर अपने प्रभावों का इस्तेमाल करते हुए आप आसिफ सुल्तान की तत्काल रिहाई और उनके खिलाफ लगे सारे आरोपों की वापसी सुनिश्चित करायें.”

आसिफ, जोकि कश्मीर नैरेटर नाम की पत्रिका में बतौर सहायक संपादक कार्यरत थे, को पिछले साल 12 अगस्त को बटमालू में हुई गोलीबारी की घटना के बाद गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत पहली बार दर्ज प्राथमिकी के अंतर्गत 27 अगस्त को जम्मू – कश्मीर पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था.

आसिफ को पुलिस द्वारा उनकी पत्रिका में बुरहान वानी पर छपे आवरण – कथा, जिसमें विभिन्न हथियारबंद संगठनों के कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार शामिल थे, के बाद उठाया गया. खबरों के मुताबिक, अन्य बातों के अलावा उनसे अपनी स्टोरी के स्त्रोतों के बारे में खुलासा करने को कहा गया और यह पूछा गया कि उन्होंने इस स्टोरी के बजाय राज्य में सरकार द्वारा कराये गये विकास – कार्यों के बारे में क्यों नहीं लिखा.

श्री मालिक को भेजे गये एक फैक्स, जिसकी प्रति केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को भी भेजी गयी है, में सीपीजे ने लिखा, “हम इस बात पर जोर देना चाहेंगे कि सरकार की आलोचना करने वाले लोगों का साक्षात्कार करना या उन्हें अपने सूत्र के तौर रखना एक पत्रकार के काम के दायरे में आता है और इसे किसी अपराध से नहीं जोड़ा जा सकता. कश्मीर में चल रहे संघर्ष जैसी एक महत्वपूर्ण एवं ख़बर लायक घटना के बारे में लिखना एक जन – सेवा है, न कि कोई आपराधिक काम.”

सीपीजे के पत्र में यह भी कहा गया कि पत्रकारों को कश्मीर में बहुत ही ख़राब माहौल में काम करना पड़ता है. पत्र में कहा गया, “हम प्रेस की आज़ादी को लेकर बेहद चिंतित हैं. अतीत में, सीपीजे ने शुजात बुखारी की हत्या समेत पत्रकारों पर हमले की विभिन्न घटनाओं और संवाददाताओं को उनके काम के चलते हिरासत में लेने एवं पूछताछ करने की घटनाओं का दस्तावेजी संकलन किया है.”

वर्ष 2018 के प्रेस स्वतंत्रता के विश्व सूचकांक में भारत दो पायदान नीचे फिसलकर 136वें से 138वें स्थान पर खिसक गया है, जोकि म्यांमार से एक स्थान नीचे और पाकिस्तान से एक स्थान ऊपर है. कश्मीर में पत्रकारों को अक्सर अधिकारियों की बात न मानने के लिए उनके कहर का शिकार बनना पड़ता है.

पिछले साल सितम्बर में, कामरान युसूफ नाम के एक अन्य पत्रकार को एनआईए द्वारा कथित रूप से पत्थरबाजों को प्रोत्साहित करने और लोगों को सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. हालांकि, पुलिस द्वारा इस संबंध में सबूत पेश करने में असफल रहने पर उन्हें जमानत दे दी गयी.
 

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