दलित मित्र या दलित शत्रु?

दलित मित्र या दलित शत्रु?

Update: 2018-04-24 13:12 GMT

डॉ भीमराव अम्बेडकर की जयन्ती के अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ को अम्बेडकर महासभा ने दलित मित्र की उपाधि से नवाज़ा है।

यह वही सरकार है जिसने दलित बच्चों की शिक्षा के लिए जिला सहारनपुर में 300 से ऊपर केन्द्र चला रही है भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद ’रावण’ को गिरफ्तार कर लिया था। 2 नवम्बर, 2017 को उच्च न्यायालय ने चंद्रशेखर व उनके साथी कमल वालिया के खिलाफ चार मुदकमों को असत्य व राजनीति से प्रेरित बताया और उन्हें जमानत दे दी। उत्तर प्रदेश सरकार ने चंद्रशेखर आजाद ’रावण’ को जमानत मिलते ही उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया जो ’रावण’ के प्रति उसकी असुरक्षा दिखाता है।

अनुसूचित जाति व जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 को शिथिल किए जाने के विरोध में 2 अप्रैल, 2018 राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन में योगी सरकार ने दलितों का भरपूर हिंसक दमन किया। मेरठ में एक दलित लड़का पुलिस की गाली से मारा गया, 9,000 लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए जिसमें से करीब 500 गिरफ्तार किए गए। कई लड़कों को कट्टा पकड़ा कर उनसे बरामदगी दिखा हथियार अधिनियम के अंतर्गत धाराएं लगाई गई। मुजफ्फरनगर में भी एक दलित लड़का पुलिस की गाली से मारा गया, 7,000 लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए जिसमें से करीब 250-300 गिरफ्तारियां हुईं। सहारनपुर में 900 भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं पर मुकदमे दर्ज हुए। इलाहाबाद में 27 छात्रों के खिलाफ इस आंदोलन में शामिल होने की वजह से मुकदमे दर्ज हुए। इन सभी मामलों में बलवा करना, सरकारी काम में बाधा पहुंचाना, सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाना, हथियार अधिनियम, हत्या का प्रयास जैसी गम्भीर धाराएं लगाई गईं। मेरठ में बहुजन समाज पार्टी की महापौर सुनीता वर्मा के पति व भूतपूर्व विधायक योगेश वर्मा को स्थिति पर काबू पाने में मदद देेने के लिए बुलाया गया और फिर अपमानित कर गिरफ्तार किया गया। क्या कोई कह सकता है कि उ.प्र. में दलित हितैषी सरकार है? उ.प्र. में पुलिस महानिरीक्षक पद से सेवा निवृत हुए एस.आर. दारापुरी का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में अनुसूचित जाति व जनजाति के खिलाफ अत्पीड़न के मामले अपेक्षाकृत बढ़ गए हैं।

फरवरी 2018 में उन्नाव जिले की एक 18 वर्षीय दलित लड़की मोनी जो साइकिल से कहीं जा रही थी को कुछ लोगों ने रोककर घेरा और उसके ऊपर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी। उसने भागने की कोशिश की लेकिन कुछ दूर जाकर दम तोड़ दिया। इससे पहले जनवरी में बलिया के रसड़ा कस्बे में दो दलित युवाओं पर गाय चोरी का आरोप लगा हिन्दू युवा वाहिनी के लागों ने दोनों के सर मुड़वा, गले में टायर व तख्तियां जिसपर लिखा था ’हम गाय चोर हैं’ डाल कस्बे में घुमाया। इसी जिले में मार्च माह में एक दलित महिला रेशमा देवी जिसने रु. 20,000 कर्ज लेकर लौटा दिया था पर सूद देने का दबाव बना रहे सोनू व सिद्धू सिंह ने उसके न मानने पर उसके ऊपर पेट्रोल डाल उसे जला दिया।

वैसे तो योगी सरकार में दलित उत्पीड़न के कई मामले हुए हैं लेकिन अम्बेडर जयंती के दिन ही दो गांवों में दलितों को मायूस होना पड़ा क्योंकि वे डॉ. अम्बेडकर व महात्मा बुद्ध की प्रतिमाएं नहीं लगा पाए।

बाराबंकी जिले के देवा थाना क्षेत्र के सरसौंदी गांव में ग्राम सभा के अभिलेखों में 0.202 हेक्टेयर भूमि जिसका गाटा संख्या 312 है अम्बेडकर पार्क के नाम से दर्ज है। गांव वासी अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर डॉ अम्बेडकर की प्रतिमा लगाना चाह रहे थे। अम्बेडकर जयन्ती के कार्यक्रम की पुलिस से लेकर सांसद प्रियंका सिंह रावत तक से अनुमति ले ली गई थी। किंतु कार्यक्रम के ठीक पहले लेखपाल कमलेश शर्मा ने झूठी आख्या लगा दी कि उक्त भूमि का वाद बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी के यहां चल रहा है जिसमें गांव के ही दो नागरिकों कबीर अहमद व प्रमोद चैहान को गवाह दिखाया गया है। चकबंदी कार्यालय से सम्पर्क करने पर यह बताया गया कि उक्त भूमि को लेकर उनके यहां कोई बाद लम्बित नहीं है और दोनों गवाह पछता रहे हैं कि उनसे धोखे से हस्ताक्षर करा लिए गए। शिकायतकर्ता कन्हैया लाल एक ईंट भट्ठा मालिक हैं व ग्राम सभा के निवासी भी नहीं हैं। स्पष्ट है कि लेखपाल दलित विरोधी मानसिकता से ग्रसित है।

सीतापुर जिले के थानगांव थाना क्षेत्र के गांव गुमई मजरा ग्राम सभा रानीपुर गोड़वा की घटना तो और भी रोचक है। गांव के दलित निवासी गुलशन पुत्र बनवारी अपनी निजी भूमि पर भगवान बुद्ध व डॉ अम्बेडकर की मूर्तियां लगाना चाह रहे हैं। जहां ये मूर्तियां लगनी हैं वहीं सटी भूमि पर एक अधूरा मंदिर का ढांचा खड़ा है। बिना छत के मात्र चार दिवारें हैं और अंदर कुछ भी नहीं। किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं लगी है। ये भूमि जगरानी पत्नी स्व. मेड़ीलाल, जो पूर्व में ग्राम प्रधान भी रहे चुके हैं, की है और वे भी चाहतीे हैं कि गुलशन की भूमि पर बुद्ध व अम्बेडकर की प्रतिमाएं लगें। बल्कि वर्तमान में सुरक्षा की दृष्टि से दोनों मूर्तियां जगरानी के ही घर में रखी गई हैं। इलाके के कुछ सर्वण लोगों ने भारतीय जनता पार्टी के विधायक ज्ञान तिवारी के संरक्षण में बुद्ध व अम्बेडकर की मूर्तियों के रखे जाने का विरोध किया है। ये सभी लोग ग्राम पंचायत के निवासी नहीं है और इस अर्थ में बाहरी हैं। पुलिस ने आख्या लगा दी है कि बगल में देवी का स्थान होने से बुद्ध व अम्बेडकर की मूर्तियां रखे जाने के वक्त विवाद खड़ा हो सकता है। जगरानी, जिनकी भूमि पर अधूरे मंदिर का ढांचा खड़ा है, को मूर्तियां लगाए जाने से कोई आपत्ति नहीं है और न ही उनका गुलशन के परिवार से कोई विवाद है।

अब दोनों ही गांवों के दलितों को जिलाधिकारी को आवेदन देकर शासन से मूर्तियां रखने की अनुमति दिलाने की मांग करनी पड़ेगी। दोनों मामलों को लालफीताशाही में उलझा दिया गया है। पता नहीं अनुमति मिलने में कितने दिन लगें अथवा अनुमति मिले ही नहीं। ऐसी स्थिति में शायद न्यायालय की शरण में जाना पड़ेगा। दलित मित्र मुख्यमंत्री के शासन में उनके दल के लोगों व शासन-प्रशासन की दलित विरोधी मानसिकता साफ दिखाई पड़ती है।
 

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