किसानों की रैली : विभाजनकारी राजनीति का एक माकूल जवाब

दिल्ली की सडकों पर मेहनतकशों का जन – सैलाब

Update: 2018-09-07 14:40 GMT

मुझे देर हो चुकी थी और देर रात शुरू हुई बारिश सुबह तक जारी थी. मैं रामलीला मैदान में लगे उन शिविरों के बारे में चिंतित था, जहां हजारों किसानों, श्रमिकों और भूमिहीन मजदूरों को 5 सितम्बर की रैली से पहले रात बितानी थी. अब वहां जाने का कोई मतलब नहीं था. इसलिए मैंने सीधा संसद मार्ग, जो सत्ता – संचालन के केंद्र को शेष भारत से जोड़ता है, पहुंचाना तय किया. इसी जगह पर उक्त रैली का समापन होना था.

भारी बारिश के कारण रैली के असरदार होने की उम्मीद मुझे नहीं थी. दूर – दराज से आये हुए लोगों के पास इस रैली में शामिल होने के अलावा और कोई चारा नहीं था, लेकिन आसपास के राज्यों से लोगों के पहुंचने के आसार कम नजर आ रहे थे. मौसम द्वारा लोगों के उत्साह और जोश में खलल डालने की पूरी संभावना थी. आख़िरकार किसान और मजदूर भी तो इंसान हैं और अन्य लोगों की तरह ही ख़राब मौसम से प्रभावित होते हैं.

मेट्रो में बैठते हुए मुझे उन स्वर्णिम दिनों की याद आई जब भारत में वामपंथ एक मजबूत राजनीतिक शक्ति हुआ करती थी. हमलोगों ने दिल्ली में कई विशाल जुलूस और प्रदर्शन देखे थे. बोट क्लब प्रतिरोध का केंद्र हुआ करता था और यहां, खासकर आपातकाल के बाद, सीपीएम, सीपीआई और वामपंथी दलों ने 70 और 80 के दशक में कई यादगार रैलियां की थीं. इन प्रदर्शनों में, औद्योगिक श्रमिकों, किसानों, युवाओं एवं मध्यम वर्ग के कई जनसंगठनों ने पूरे जोशोखारोस के साथ भाग लिया था.

हम बार – बार यह पढ़ते और सुनते आये हैं कि ‘भारत में बीते तीस सालों में वामपंथ लगातार कमजोर हुआ है और हाशिए पर चला गया है’. वामपंथी सांसदों की संख्या में आई कमी और पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा में मिली चुनावी हार में यह हकीकत परिलक्षित होती है. हालांकि अपने स्वर्णिम दिनों में भी वामपंथी दलों के पास अन्य दलों के माफिक भीड़ खरीदने लायक पैसे कभी नहीं जुटे. केरल, जो अभी भी कुदरत का कहर झेल रहा है, के अलावा वे देश के किसी और राज्य में सत्ता में नहीं हैं ताकि भीड़ जुटाने के लिए नौकरशाही पर दबाव बना सकें.

मुझे उस राजस्थान की याद आयी, जहां सत्तारूढ़ भाजपा पर अपने राजनैतिक कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए सरकारी संसाधनों और मशीनरी के दुरूपयोग के आरोप लगते रहे हैं. अभी कुछ महीने पहले मुंबई तक निकली लंबी मार्च के उलट भाजपा – नियंत्रित मीडिया ने इस रैली को पूरी तरह से नजरंदाज़ किया. देश के किसी भी हिस्से, यहां तक कि दिल्ली में इसके बारे में कोई चर्चा नहीं थी. इस कार्यक्रम के बारे में या इसमें शामिल होने के लिए लोगों को आमंत्रित करने वाले बड़े - बड़े होर्डिंग या पोस्टर कहीं नहीं लगे थे. और इन सब कड़वी हकीकतों से भी ऊपर, बारिश ने आम जनजीवन को पूरी तरह अस्त – व्यस्त कर दिया था.

मैं शिवाजी स्टेडियम मेट्रो स्टेशन से बाहर निकला और उम्मीद के मुताबिक मुझे कोई असामान्य भीड़ नहीं दिखाई दी. बारिश थम चुकी थी और मेरी निराशा बढ़ गयी. मैं बंगला साहिब गुरुद्वारा की ओर मुड़ गया, भीड़ अभी भी असामान्य रूप से बड़ी नहीं थी, लेकिन लाल झंडा थामे कुछ लोग जाते हुए नजर आये. मैंने उनमें से एक को रोककर पूछा कि ‘क्या रैली समाप्त हो गयी है? क्या आपलोग वापस जा रहे हैं?’ उसने जल्दी से जवाब दिया, ‘ नहीं, रैली चल रही है.’

मैं वाईएमसीए की तरफ बढ़ने के लिए एक बार फिर बायीं ओर मुड़ा और हैरान रह गया. मुझे अपनी आंखों पर सहज विश्वास नहीं हुआ. मुझे लाल झंडे, तख्तियां और लोगों का हुजूम नजर आया. पानी की एक बूँद की माफिक मैं लोगों के समुद्र में समा गया और लहरों के साथ बहने लगा. यह पहला मौका था जब देशभर से भूमिहीन मजदूर समेत कामगार और किसान एक साथ सरकारी नीतियों के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए जुटे थे. पालिका बाज़ार से संसद मार्ग पुलिस थाना तक तिल रखने भर की जगह नहीं थी.

मैंने रैली के अंतिम छोर से थाना के निकट बने अस्थायी मंच की ओर जाने का निर्णय किया. यह एक बेहद मुश्किल काम था और इसमें मुझे एक घंटा से अधिक समय लग गया. लेकिन मैं इस प्रदर्शन को इसकी सम्पूर्ण भव्यता और तेवर में देखने के लिए कटिबद्ध था. विभिन्न संगठनों के नेताओं ने बारी – बारी से कामगारों और किसानों की इस रैली को संबोधित किया और लोगों ने तालियां बजाकर उन्हें सराहा. रैली में शामिल लोग पूरे उत्साह से लाल झंडा लहरा रहे थे.

जब तक मैं घेरे के पास पहुंचा, सीपीएम के महासचिव कामरेड सीताराम येचुरी मंच पर आ चुके थे. उन्होंने हाथ हिलाकर लोगों का अभिवादन किया और उन्हें सलामी दी. उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया. आखिरकार यह जनसंगठनों की रैली थी, न किसी पार्टी की. वे सिर्फ अपनी पार्टी की ओर से इस रैली के प्रति समर्थन व्यक्त करने आये थे. बिना किसी शोरशराबे के वे जिस तरह मंच पर आये थे, उसी तरह चुपचाप लौट गये.

देशभर के कामगार और मेहनतकश लोग महंगाई पर रोक लगाने, रोजगार के अवसर और उसकी सुरक्षा देने, जबरिया भूमि अधिग्रहण पर रोक लगाने और प्राकृतिक आपदा के शिकार लोगों को उचित मुआवजा देने की मांग के साथ संसद मार्ग पर जुटे थे.

इसके अतिरिक्त, न्यूनतम मजदूरी 18,000/- रूपए प्रति माह निर्धारित करने और किसानों के ऋण माफ़ करने जैसी उनकी कुछ खास मांगे भी थीं.

क्या भारत के प्रत्येक नागरिक को इन मांगों को नहीं उठाना चाहिए?

इस रैली में न तो भारत माता का कोई नारा था, न ही श्रीराम और अल्लाह हो अखबर का उद्घोष था. छदम – राष्ट्रवाद नदारद था. ‘सीमा पे जवान...’ भी नहीं सुनायी दिया. यह रैली विभाजनकारी राजनीति का एक मजबूत जवाब थी.
 

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