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पी एस कृष्णन | 5 FEBRUARY, 2018

दलित – आदिवासियों के नाम पर भरमाने वाला बजट

पुराना रवैये से बाज नहीं आती सरकार


विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में पिछले कई सालों से चला आ रहा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के हितों की उपेक्षा और उसके प्रति लापरवाही का इतिहास 2018 - 19 के बजट में भी जारी है. अलग – अलग सरकारों द्वारा लाये गये पूर्ववर्ती बजटों की तरह इस बजट में भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को बुनियादी दुर्दशा से निकालने के लक्ष्य की अनदेखी की गयी है.

पिछले बजटों की तरह इस बजट में भी समानता के मकसद, जो कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का संवैधानिक अधिकार है, की अनदेखी की गयी है. इस मकसद का मतलब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों को दूसरों के मुकाबले बराबरी के स्तर तक पहुंचाना है. यानि विकास, कल्याण और जीवन की सभी कसौटियों पर सामाजिक रूप से अगड़ी जातियों (गैर - अनुसूचित जाति, गैर - अनुसूचित जनजातियों, और गैर – सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ी जातियों) के साथ समानता. संविधान के मुताबिक इस किस्म की समानता लाना सरकार का दायित्व है.

बजट में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को उनकी दुर्दशा से निजात दिलाने के लिए समाज के इन वर्गों के प्रत्येक परिवार के साथ – साथ अन्य भूमिहीन ग्रामीण कृषि मजदूरों के परिवारों को सरकारी और भूदान की जमीनों को प्रत्येक तहसील/ तालुका/ मंडल में केंद्र द्वारा वित्त – पोषित टास्क फोर्स के माध्यम से वितरित करने जैसे व्यापक राष्ट्रीय कार्यक्रम को भी इस बजट में जगह नहीं दी गयी है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों को मिली ऐसी सभी जमीनों को सामूहिक लघु सिंचाई व्यवस्था से लैस करना था.

हैरत है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए केन्द्रित होने और देश की आर्थिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर इसके दूरगामी असर होने (जिसके बारे में मैंने इस सरकार के साथ – साथ कई पूर्ववर्ती सरकारों को बार बार अवगत कराया) और 2004 में संसद के संयुक्त अधिवेशन को अपने संबोधन में राष्ट्रपति द्वारा इस बारे में देश को वचन दिए जाने के बावजूद बजट में इसकी अनदेखी की गयी.

प्रत्येक जनजातीय – बहुल प्रखंड और 20 हजार जनजातीय आबादी वाले इलाके में एकलव्य स्कूल का प्रावधान जनजातीय लोगों में शिक्षा के प्रसार के लिहाज से एक स्वागत योग्य कदम हो सकता है. लेकिन बजट में इसके लिए आवंटन नदारद है और इसकी व्यवस्था करने की जरुरत है. गौरतलब है कि देश के प्रत्येक प्रखंड में अनुसूचित जाति के लड़कों और लड़कियों के लिए अलग – अलग एक आवासीय विद्यालय खोलने का सुझाव 2008 में प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व वाली दलित मामलों से संबद्ध मंत्रियों के समूह द्वारा दिया गया था. लेकिन इस सुझाव की अनदेखी की गयी है.

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए पढ़ाई लिखाई के मामले में समानता लाने वाली अन्य स्कीमों की भी उपेक्षा की गयी है. कुल 11000 करोड़ रूपए की मैट्रिक बाद दी जाने वाली छात्रवृति राशि बकाया है. इस बारे में पत्र के माध्यम से 9 सितम्बर, 2016 और फिर 31 दिसम्बर 2017 को मेरे द्वारा वित्तमंत्री को ध्यान दिलाने के बावजूद न तो 2017 – 18 के राजस्व खर्च में और न ही 2018 -19 के बजट खर्च में इसके लिए किसी राशि का प्रावधान किया गया है.

बकायों का इस किस्म से ढेर लगते जाना इस स्कीम के बुनियादी मकसद के खिलाफ है. इसका मतलब यह हुआ कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों की किसी भी संख्या के लिए मैट्रिक बाद दी जाने वाली छात्रवृति की राशि, चाहे वह कितनी भी हो, का वितरण समय पर किया जायेगा और उसे बाद वाले राजस्व व्यय में समायोजित किया जायेगा. इस शर्त के उल्लंघन और बकायों के ढेर की वजह से बड़ी तादाद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को फीस जमा न करा पाने पर शिक्षा संस्थानों से बाहर होने को मजबूर होना पड़ रहा है.

जनजातीय लोगो की जमीन को खोने से बचाने और पहले से खोयी हुई जमीन को वापस लाने के उपाय इस बजट में भी नदारद हैं.

ऊपर जिन मकसदों के बारे में बातें की गई है और स्कीमों को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक विशेष घटक योजना (स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान) और जनजातीय उप – योजना (ट्राइबल सब – प्लान) में पर्याप्त आवंटन के प्रावधानों, जोकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी – अनुपात से कम नहीं होना चाहिए, में सकल घाटा जारी है.

अनुसूचित जाति के लिए विशेष घटक योजना (स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान) के तहत आवंटन और अनुसूचित जनजाति के लिए जनजातीय उप – योजना (ट्राइबल सब – प्लान) के तहत आवंटन के प्रावधानों में सही प्रक्रिया अपनाने से बचना जारी है. मसलन एक संयुक्त कोष के तौर पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के हिस्से का निर्धारण. इस कोष के तहत ऐसे स्कीमों का संचालन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को ऊपर वर्णित समानता के स्तर को हासिल करने और बुनियादी दुर्दशा से निकालने में सहायक साबित होगा.

2018 -19 के कुल बजटीय व्यय में से केन्द्रीय क्षेत्र के स्कीमों और केंद्र द्वारा प्रायोजित स्कीमों के व्यय लिए 1014450.79 करोड़ रूपए निर्धारित है. इसमें से अनुसूचित जाति के विशेष घटक योजना (स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान) के लिए खर्च / कल्याण के लिए आवंटन 16.6 % से कम नहीं होने के हिसाब से किसी हालात में 168398.83 करोड़ रूपए से कम नहीं होना चाहिए. लेकिन सिर्फ 56618.50 करोड़ रूपए (16.6 % के बजाय 5. 58 %) ही दिए गए हैं. अनुसूचित जनजाति के जनजातीय उप – योजना (ट्राइबल सब – प्लान) के लिए खर्च / कल्याण के लिए आवंटन 8.6 % से कम नहीं होने के हिसाब से किसी हालात में 87247.77 करोड़ रूपए से कम नहीं होना चाहिए. लेकिन सिर्फ 39134.73 करोड़ रूपए (8.6 % के बजाय 3.86 %) ही दिए गए हैं.

क्रमशः 16.6% और 8.6% की आवश्यकता के बरक्स अनुसूचित जाति के विशेष घटक योजना (स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान) के लिए खर्च / कल्याण के लिए आवंटन में 111780.33 करोड़ रूपए की कमी और अनुसूचित जनजाति के जनजातीय उप – योजना (ट्राइबल सब – प्लान) के लिए खर्च / कल्याण के लिए आवंटन में 48108.04 करोड़ रूपए की कमी की गयी है.

यहां तक कि विशेष घटक योजना (स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान) / जनजातीय उप – योजना (ट्राइबल सब – प्लान) से संबद्ध ये प्रावधान इन योजनाओं में उन स्कीमों / कार्यक्रमों के खर्चों को शामिल करने की सही प्रक्रिया का पालन नहीं करते जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों, परिवारों, घरों, बसावटों और संस्थानों आदि को विशेष रूप से लाभान्वित करते हैं और उन्हें समानता के स्तर को हासिल करने और बुनियादी दुर्दशा से निकालने में मददगार होते हैं. इसके उलट, ये बरबस अतीत में किये गए अंकगणितीय – सांख्यकीय ( आंकड़ों ) उलटफेर के नतीजे भर हैं.

व्यक्तिगत आयकर और दीर्घकालिक पूंजीगत प्राप्ति जैसे सतही मामलों पर अपना ध्यान केन्द्रित वाले प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े अहम पहलुओं की बजट में गैर – मौजूदगी को नजरअंदाज किया है. इनमे से कईयों ने तो अपनी सतही टिप्पणियों से भरमाने का ही काम किया है.

( लेखक भारत सरकार के सचिव रह चुके हैं।)

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