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द सिटिज़न ब्यूरो | 9 NOVEMBER, 2018

कोसली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग

सरकार से इस दिशा में जल्द से जल्द पहल करने का आग्रह


कोसली क्रियानुष्ठान समिति के सदस्यों ने कोसली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की जोरदार मांग की है. समिति के सदस्यों ने एक विस्तृत बयान जारी कर सरकार से इस दिशा में जल्द से जल्द कदम उठाने को कहा है.

कोसली पश्चिमी उड़ीसा के दस जिलों के लोगों की मातृभाषा है. इसके अलावा, छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर जिले के भतरी क्षेत्र और देभोग के पूर्वी हिस्से से लेकर फुलझर, रायगढ़, सारनगढ़ और जशपुर इलाके के लोग बड़ी संख्या में कोसली भाषा को अपनी मातृभाषा के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. दो करोड़ से अधिक लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कोसली का उपयोग करते हैं.

समिति के सदस्यों ने अपने बयान में कहा है कि पिछले कुछ सालों में अलग – अलग समितियों की सिफारिशों पर केंद्र सरकार विभिन्न भारतीय भाषाओँ को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया है. यह कदम देश की भाषाई विविधताओं की जटिलता को पहचानने में केंद्र सरकार की समझदारी को दर्शाता है. पिछड़ी एवं गुमनामी की शिकार भाषाओँ को मुख्यधारा में लाने एवं उन्हें समृद्ध बनाने में मदद देने का केंद्र सरकार का यह कार्य सराहनीय है.

समिति के सदस्यों का कहना है कि एक मातृभाषा का अधिकार लोगों का एक बुनियादी सांस्कृतिक अधिकार है, जो उन्हें उनकी अर्थव्यवस्था, सामाजिक – सांस्कृतिक प्रणाली एवं राजनीतिक अधिकार से जोड़ता है. यूनेस्को ने सभी भाषाओँ के बीच समानता की अवधारणा को मान्यता दी है. इसके अलावा, भारत सरकार ने स्कूली पढाई बीच में छोड़ने की दर को कम करने एवं मातृभाषा के उपयोग के जरिए संवाद को बढ़ाने के लिए मातृभाषा पर आधारित बहु - भाषाई शिक्षा को प्रोत्साहित कर रही है. यह भारत सरकार का एक अच्छा एवं सराहनीय कदम है.

अपने तर्क में समिति के सदस्य कहते हैं कि कोसली भाषा और साहित्य का एक वृहद संसार है. और इसे कई समर्पित लेखकों का योगदान हासिल है. उनका कहना है कि स्रोतों के मुताबिक, फिलहाल तकरीबन 4500 लेखक नियमित रूप से अपनी रचनाओं से कोसली भाषा को समृद्ध कर रहे हैं. भारत में आजादी के पहले, 1895 में, ही कोसली भाषा में प्रकाशन की शुरुआत हो चुकी थी. तब से लेकर आजतक विभिन्न विधाओं – महाकाव्य, कविता, गद्य, उपन्यास, लेख, नाटक, यात्रा – वृतांत, अनुवाद, बाल साहित्य, व्याकरण, शब्द – कोश, कैलेन्डर आदि – में बड़ी संख्या में किताबें नियमित रूप से प्रकाशित हो चुकी हैं और बाजार में उपलब्ध हैं. रामायण, महाभारत, भगवद्गीता और मेघदूत जैसे महाकाव्यों का कोसली में अनुवाद हो चुका है.

आज उड़िया भाषा के संबाद, समाज, प्रमेय आदि जैसे प्रमुख दैनिक कोसली भाषा में विशेष पृष्ठ निकाल रहे हैं.

समिति के सदस्यों के मुताबिक, संबलपुर विश्वविद्यालय कोसली भाषा में पीजी डिप्लोमा का पाठ्यक्रम उपलब्ध करा रहा है और कुदोपाली स्थित हलधर आवासिक वनाबिद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में कोसली भाषा के दो प्रवेशिकाओं को शामिल किया है.

उनका कहना है कि पश्चिमी उड़ीसा के लोगों के लिए कोसली महज एक भाषा मात्र नहीं है बल्कि एक जीवनशैली है जो उस इलाके में विकास और सदभाव को गति प्रदान करता है.

समिति के सदस्यों के मुताबिक, संविधान की आठवीं अनुसूची में कोसली को शामिल किये जाने से पश्चिमी उड़ीसा के लोगों पर सकारात्मक असर पड़ेगा. उनका कहना है कि पश्चिमी उड़ीसा में राज्य की 40 से 50 प्रतिशत निवास करती है. कोसली भाषा पश्चिमी उड़ीसा में विकास की कुंजी है. ग्रामीण एवं आदिवासी इलाकों में बच्चों द्वारा बीच में ही पढ़ाई छोड़ने के अन्य कारणों में से एक उड़िया भाषा में पढ़ाई है. जबकि उस इलाके के रोजमर्रा की जिंदगी में संवाद के लिए उड़िया भाषा का उपयोग नहीं किया जाता. यह एक अंजान भाषा में सीखने जैसा है. समूचे पश्चिमी उड़ीसा में कोसली भाषा संवाद का अहम माध्यम है. यो तो राज्य में कई जनजातीय भाषाएं हैं, लेकिन सभी जनजातीय समुदाय उड़िया के बजाय कोसली भाषा में कामचलाऊ संवाद में सक्षम हैं. साक्षरता दर के कम रहने का मुख्य कारण यही है. इससे इलाके में बड़ी तादाद में जनजातीय समुदाय प्रभावित है. इसकी वजह से कई समस्याएं पैदा हुई हैं. मसलन, पश्चिमी उड़ीसा के छात्रों के प्राप्तांक तटीय उड़ीसा के छात्रों के मुकाबले कम होते हैं; और उड़िया भाषा का कम ज्ञान होने के कारण पश्चिमी उड़ीसा के कई मेधावी छात्र 10 वीं और 12 वीं की परीक्षा में बार – बार अनुतीर्ण होते हैं. समिति के सदस्यों का कहना है कि कोसली भाषा को मान्यता मिलने से पश्चिमी उड़ीसा के छात्रों को उनकी मातृभाषा में मिलने लगेगा और उनकी उपरोक्त समस्याएं हल हो जायेंगी. उनका मानना है कि आक्रामक उड़ियाकरण के बावजूद, पश्चिमी उड़ीसा के लोगों ने रोजमर्रा की जिंदगी में कोसली भाषा को बचाये रखा है.

अनुसंधान एवं विकास

समिति के सदस्य बताते हैं कि कोई सरकारी आर्थिक सहायता न मिलने के बावजूद कोसली भाषा में शब्द – कोश, व्याकरण की किताबें, नाटक, उपन्यास, कविताओं की पौराणिक कथाएं, प्रमुख कवियों की ग्रंथावलियां, कोसली पंजिका, कोसल (पश्चिमी उड़ीसा) के इतिहास से संबंधित विभिन्न किताबें और कोसली नायकों की जीवनी उपलब्ध हैं. कोसली भाषा को मान्यता मिलने से उसे केंद्र सरकार सीधे अनुदान प्राप्त हो सकेगा. इससे भविष्य में कोसली भाषा में अनुसंधान एवं विकास का काम संभव हो सकेगा. यही नहीं, राष्ट्रीय पुरस्कार (क्षेत्रीय भाषा) के लिए कोसली भाषा की फिल्मों पर तभी विचार किया जायेगा जब इस भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जायेगा.

प्रशासन में आसानी

समिति के सदस्यों के मुताबिक, वर्तमान में, पश्चिमी उड़ीसा के गांवों में उड़िया भाषा में नोटिस दिये जाते हैं. कम पढ़े – लिखे लोग उन नोटिसों का पूरा मतलब नहीं समझ पाते. दूसरे क्षेत्रों से आने वाले प्रशासनिक अधिकारी कोसली भाषा का बुनियादी ज्ञान न होने के कारण आम नागरिकों के साथ संवाद नहीं कर सकते, लिहाज़ा संवादहीनता की स्थिति पैदा होती है. दरअसल, उड़ीसा उन गिने – चुने राज्यों में से है जिसके पास सिर्फ एक भाषा होने का दावा है. कुल 29 राज्यों में से, 15 राज्यों के पास एक से अधिक आधिकारिक भाषा है. कुल 7 केंद्र शासित प्रदेशों में से सभी के पास एक से अधिक मान्यता प्राप्त भाषाएं हैं. लोकतंत्र में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है. बेहतर प्रशासन के लिए सरकार एवं नागरिकों के बीच प्रभावी संवाद होना जरुरी है. इस संदर्भ में, कोसली भाषा का संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किये जाने पर पश्चिमी उड़ीसा में बेहतर प्रशासन मुहैया कराने में सुविधा होगी.

न्यूज़ सरोवर


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