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विजय चावला | 28 NOVEMBER, 2018

किसान क्यों आ रहे हैं दिल्ली

उदारवादी नीतियों और शोषण का कसता शिकंजा


वर्तमान कृषि संकट की जडें कृषि सम्बंधित नीतियों के कारण है इनमें से मुख्य है :

१..सार्वजनिक क्षेत्र के निवेश में कटौती;

२.कृषि को बैंक से मिलने वाले क़र्ज़ में कमी ;

३.सार्वजनिक क्षेत्र की प्रसार सेवओं का लगभग बंद होना ;

४. ग्रामीण क्षेत्र में सरकार द्वारा किये जाने वाले खर्चों में कटौती ;

५.कृषिं को आयात के लिए खोलना ;

६.सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा खरीददारी और मूल्य स्थिरीकरण उपायों में कमी ;

७.कृषि के लागत मूल्यों में वृद्धि और सरकार द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले उत्पादों के मूल्यों में वृद्धि ;

८. विभिन्न योजनाओं के लिए किसानों की ज़मीनों का जबरन अधिग्रहण शामिल है . इसलिए यह स्पष्ट है कि यह स्थिति भारत की उदारवादी नीतियों के कारण है ।

कुछ अन्य प्रभाव इस प्रकार हैं:

१. वैश्वीकरण और उदारवादी नीतियों से कृषि पर शोशंणकारी शक्तियों के शिकंजे पहले से ज़्यादा.

२. बैंक लोन में कमी से किसानों पर महाजनों का शिकंजा और अधिक हो जाना ;

३. कृषि में उत्पादनकारी शक्तियों को प्रोत्साहित करने के स्थान पर , जिस प्रकार से कृषि में प्रयोग होने वाली वस्तुओं के व्यवसायीकरण में वृद्धि हो रही है उससे उत्पादन से लाभ को उत्पादन शक्तियों के अधिक विकास के लिए निवेश करने के बजाय , उन्हें अधिक निचोड़ा है और सूद्खोरों के सामने उन्हें पहले से अधिक लाचार बना दिया है .

४. चुंकि विनिर्माण में वृद्धि नहीं हुई है और उसमें अधिक रोज़गार नहीं उत्पन्न हुआ है, इसलिए इस ठहराव की स्थिति के कारण किसान को खेती में लगे रहने को मजबूर कर दिया है चाहे उसे इसमें लाभ नहीं हो रहा हो. यद्यपि भवन निर्माण में वृद्धि हुई है लेकिन यह बहुत आकर्षक नहीं है .क्योंकि इसमें न तो उचित्त वेतन ही मिलता है और न ही सुरक्षा .

भारत की वर्तमान आर्थिक राजनैतिक सामाजिक ढाँचे को बनाये रखने में मौजूदा कृषि सम्बन्धों की महत्वपूर्ण भूमिका है.

*इस व्यवस्था के कारण बड़ी संख्या में बेरोजगार और अर्द्ध रोज़गार मिलते हैं . यह एक प्रकार की ऐसी बेरोजगार मजदूरों की सेना है जो अपनी मौजूदगी से विभिन्न क्षेत्रों में मजदूरी की दरों को नीचे रखने में सफल हो जाती है. इसे पूंजीपतियों की आरक्षित फ़ौज कहा गया है.इसके अलावा गाँव में एक ख़ास वर्ग को पैदा करता है जो सभी पर अपना प्रभुत्व स्थापित करता है . वर्तमान के सामजिक –आर्थिक ढाँचे का समर्थन करता है और लोगों को आपस में बांटने का काम करता है . ऐसी सोच बनाता है के लोग शासन – सता से जी हजूरी करते रहे ; . और यह एक निरंकुश शासन का राजनातिक आधार तैयार करता है.. यथास्थिति को बनाए रखने में इसका महत्वपूर्ण योगदान है.

*1947 में सत्ता के हस्तांतरण के समय परजीवी शक्तियों: ज़मींदार, बिचौलियों , सूदखोर और अधिकारी ,का उत्पादकों पर शोषण बहुत अधिक था इनका अधिकाँश पैसा, किराये औरत्याधिक ब्याज से इन्ही वर्गों द्वारा ले लिया जाता था. इसलिए इनके पास खेती में उन्नति करने के लिए पैसे नहीं रह जाते थे. इस परजीवी वर्ग ने यह पैसा खेती में नहीं लगाया . जिससे किसान की आमदनी घटी । इसके कारण किसान की वस्तु खरीदने , क्रय शक्ति, में कोई वृधि नहीं हुई है और वह कारखानों में बने सामन को खरीदने की हैसियत नहीं रही ; इसका नतीजा यह हुआ की कारखानों में बने सामान के लिए खरीदार भी कम हो गए .इससे औद्यगिक विकास भी रुका और कृषि का विकास भी रुक गया. इसलिए सरकारों ने कृषि सुधार, ढांचागत परिवर्तन इत्यादि जैसी चीज़ों की बात सोची गयी जिसका उद्देश्य यह था की प्रतिगामी संबंधों को समाप्त किया जाय, शोषक वर्ग की शक्तियों को नष्ट किया जाय.लेकिन हुआ कुछ नहीं. शासक वर्गों ने सरकारी मशीनरी की चलने ही नहीं दिया . फायदा लाभ बहुत कम रहा .

1960 के दशक के मध्य तक अभाव दूर करने के लिए श्रेष्ठ भूमि और विकसित इलाकों में उत्पादकता में बढोत्तरी , जिसे हरित क्रांति कहा गया, का सहारा लिया गया. इससे उपज में तो वृद्धि हुई, लेकिन उसका अंजाम आज भी हम झेल रहे हैं . रसायनिक खाद के निरंतर बढ़ते इस्तेमाल से भूमि की उर्वरा शक्ति कम होते जा रही है और उपज भी घटती जा रही है . लेकिन वर्ष १९७० के बाद से किसानों के सशस्त्र संघर्ष के कारण ही भूमि सुधार की बात को फिर से चर्चा में ला दिया और इसे कार्यसूची का हिस्सा बनाया गया. लेकिन नीतियों में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं हुआ.लेकिन वर्ष १९९१ से शुरू हुए वर्तमान ‘नव- उदारवादी’ युग (यानी बड़ी पूंजी-विदेशी पूंजी के गठजोड़ के युग में) भूमि सुधार कार्यसूची से गायब हो गया . उदारवादी सोच , भूमि सुधार और सरकारी हस्तक्षेप के विरोध में है.

इस दौर में सीधे तौर पर पूंजीवादी कृषि को लागू करने की कोशिश की गई है . परंपरा गत कृषि फसल, व्यवस्था के स्थान पर निर्यात के उद्देश्य से कृषि में उत्पादन के लिए कृषि में कोरपोरेट घरानों के प्रवेश के पक्षधर एक लौबी काम कर रही हैं जिसका मकसद भू-हदबंदी की सीमा को बढ़ाना या ख़त्म करना , जोतदारी ( काश्तकारी ) व्यवस्था को स्वीकारना और भू पट्टा सम्बंधित नियमों और शर्तों का निर्धारण मुक्तबाज़ार की शक्तियों द्वारा करवाना है.

काश्तकारी को शुरू में कृषि विकास में सर्वाधिक् अड़चन वाला माना गया था.इसलिए काश्तकारों के पक्ष में क़ानून बनाए गए लेकिन यह इस प्रकार से बने कि अधिकांश स्थानों से काश्तकार ही उखड गये . भू स्वामियों में यह डर पैदा हो गया कि कही उनके हाथ से ज़मीन चली ना जाय ; इसलिए चोरी छुपे यह कार्य जारी रहा. भू स्वामियों को यह डर होने के बाद से उन्होनें काफी ज़मीन परती छोड़ दी. इससे समस्या और अधिक विकराल हो गयी . इसके लिए भू-खरीददार और सरकारी तंत्र जिम्मेवार है. और इसने काश्तकारी प्रथा को जीवित करने के लिए एक और तर्क प्रदान किया .

किसान आत्महत्या के कारण:

इसके लिए ना केवल किसान बल्कि सूद्खोर और व्यापारी को भी अथवा आढ़तियों की भी भूमिका है लेकिन आज के पूंजीवादी विचारक , व्यवस्था के पोषक इन्हें अलग अलग तरीके से देखते हैं और इन्हें ज़मींन के सवाल से भी अलग करके देखते हैं . सता के पक्षधरों का यह कहना है की बैंक में खाते खुलवाकर वित्तीय समावेश और र्किसानों की उपज को बड़ी पूंजी के संस्थानों को बेचकर, अधिक बेहतर पैसा मिलेगा .किसानों की आत्महत्या के नीचे लिखे करण हैं

१. वैश्वीकरण की नीतियाँ;२. कृषि उत्पादन में लगने वाली वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ;३. बीज के लिए मोनसेंटो, जैसी विदेशी कंपनियों पर निरभरता ,४. सरकार द्वारा शोध इत्यादि में सहायता नहीं करना ,५., सार्वजनिक खरीद को संयोजित ढंग से ख़तम करना;६. कृषि आयात के लिये देश के बाज़ार को खोलना और ७. वस्तुओं के वैश्विक मूल्यों में उतार चड़ाव से किसानों में बड़ी लाचारी . इसमें स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग भी बढ़- चढ़ कर हिस्सा लेते हैं .

किसान की समस्या को समझ्ने और उससे निकलने के रास्ते खोजने के लिए ४ बातों को समझ्ना ज़रूरी है.

१. भूमि संबंधों की असमानता, २. काश्तकारी व्यवस्था ;३. सूदखोरी और४. व्यापारियों का शोषण; यहाँ हमारा उद्देश्य अकादमिक ज्ञान को बढ़ाना नहीं है, बल्कि यह समझना है की जन साधारण की ताकत से मौजूदा कृषि संबंधों में आमूल परिवर्तन कैसे लाया जाय .

योजनाबद्ध कृषि परिवर्तन के किसी भी कार्यक्रम को राजनीति द्वारा ही लागू किया जा सकता है ; अर्थात यह महत्त्वपूर्ण होगा कि कौन सा वर्ग शासन में है और उसकी क्या नीति है ? किसप्रकार से किसान आन्दोलन के द्वारा राजसत्ता को प्रभावित किया जा सकता है? इत्यादि .यह सभी प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं.तमाम प्रकार के नारों और योजनाओं के बावजूद , या शायद उनके कारण ही, आज गाँव में यह नहीं कह जा सकता है की यह छोटे-भू मालिकों और किसानों का निर्णायक प्रभाव है. इसके उलटे गाँव प्राय: ग्रामीण धनिक वर्ग की बेहद दमनकारी और मनमानी शक्तियों के अधीन हैं .

ग्रामीण भारत में ज़मीन आज भी ,सम्पति और शक्ति का प्रतीक है. ग्रामीण धनिकों का प्रभाव भू स्वामित्व के कारण है. अन्य कारक, जैसे उत्पादन के बाकी साधनों पर मालिकाना हक़, नाम मात्र के सामूहिक संसाधनों ( पानी , सामूहिक ज़मीन, सरकारी ज़मीन )पर नियंत्रण, जातिगत प्रभुत्व , सरकारी अधिकारियों और राजनातिक दलों के नेताओं के साथ उठना-बैठना , चुनावों पर पकड़ इत्यादि भी भू स्वामित्व से जुड़कर काम करती है .एक रसूखवाला ज़मीन मालिक क्रेडिट ,इनपुट( आगत), उपज और श्रम के बाज़ार को भी प्रभावित करता है.

एक अन्य बात पर गौर करे. धन आने पर , यहाँ पहली कोशिश यही होती है कि अपनी भूमि में विस्तार किया जाय . सम्पति विविधीकरण ग्रामीण धनिकों में कम है . मतलब यह हुआ की कुल सम्पति में ज़मीन का हिस्सा धन के साथ बढ़ता है . ग्रामीण परिवारों का १४% धनी परिवार हैं जिनकी कुल समाप्ति में ७३% हिस्सा ज़मीन का है , १५% भवन का, एक छोटा हिस्सा मशीनरी , औजार, और वित्तीय सम्पति का है . वर्ष २०१३ के भारतीय नमूना सर्वैक्षण के अनुसार २.२ % भूमि वालों के पास २४.६% कुल क्षेत्र फल की भूमि है. ७.२% के पास कुल क्षेत्र फल का ४६.७ % है.

वर्ग विभाजन .

उदारवादी नीतियों से वर्ग विभाजन और अधिक गहरा और वर्गों में अंतर में वृद्धि हुई है . कुल किसान परिवारों में छोटे और सीमान्त किसान ( २ हेक्टयेर से कम ) की संख्या ८७% है.किसानी से आय कुल औसत आय से कम है . उनके द्वारा उपभोग किये जाने वाले खर्च से भी कम. अर्थात यह इस बात को बताता है की इनका खर्च अन्य स्त्रोतों से कमाये हुए पैसे , अथवा सम्पति बेचकर ही चलता है . जिन किसानों के पास ४-१० हेकतयेर के मध्य भूमि है , उनकी किसानी से प्राप्त होने वाले आय , छोटे और सीमान्त किसानों की औसत आय की ६.४ गुना है ; और इसी प्रकार जिनके पास १० हेक्टेयर से अधिक भूमि है उनकी आय और सीमान्त किसान की आय का १४.५ गुना है.

प्राय: ऐसे में अधिक पैसे वालों की दौलत को कम करके आंका जाता है और निर्धन तबके को कई कमियों का सामना करना पड़ता है. जैसे कृषि के लियी आवश्यक चीजें खरीदने के लिए अधिक पैसे देने होते होंगे, सिचाई के साधनों का अभाव होता है. उन्हें बैंक से क़र्ज़ नहीं मिलता है ;अपनी उपज को अपेक्षाकृत सस्ते दाम में बेचना पड़ता है.

उदारवादी व्यवस्था के दौरान सूदखोर महाजन वर्ग काफी फला फूला है .

नमूना सर्वेक्षणों के अनुसार वर्ष १९९१ से वर्ष २०१२-१३ के दौरान ग्रामीण क़र्ज़ में महाजन,व्यापारी, और ज़मींदार के हिस्से में ६% की वृधि हुई है और इसी अवधि में ग्रामीण परिवारों में ८ % की व्रधि हुई है . यह सब केवल सूद के पैसे से नहीं बल्कि हमारा अनुँमान है की इसमें किसानों की अपनी ज़मीन और अन्य सम्पति को हस्तांतरित करने से भी होगा. ; व्यापारी द्वारा कृषि के लिए आवश्यक आगतों( इनपुट) की कीमत में वृधि करके और तैयार उपज को सस्ते में खरीदने से या उनकी कीमत गिराकर , साहूकारी और व्यापार को जोड़ दिया है.लेकिन पूंजीवादी किसान प्रबल नहीं हो पाया है,( जो श्रम शक्ति खरीद कर खेती करता है)..भूमि की जोते लगातार घट रही है. वर्ष १९७०-७१ में कुल कृषि जन संख्या ७ करोड़ १० लाख थी जो वर्ष २०१०-११ में १३ करोड़ ८४ लाख हो गई. इसी प्रकार औसत वर्ष १९७०-७१ में २.२८ हेक्टेयर थी जो कम होकर २०१०-११ में महज़ १.१५ हेक्टयेर रह गई.

कृषकीय जनतांत्रीकरण

वर्ष २००८ में दिये आंकड़ों के अनुसार हदबंदी की सीमा ८ हेक्टेयर लागू करने पर आजतक वितरित की गयी कुल ज़मीन का तीन गुना ज़मीन वितरण के लिए उपलब्ध होगी . लेकिन भारत में ऐसा कुछ नहीं हो पाया .चीन के भूमि सुधार कार्यक्रम से सबक ले के , यह कहा गया की कृषि सहकारी समितियों के गठन के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना ज़रूरी है . ऐसा माहौल बनाने में भूमि सुधार एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा.एक अन्य विशैषज्ञ डैनियल थोर्नेर के अनुसार , ‘ग्रामीण सहकारी समिति की सफलता इस पर निर्भेर करेगी की बेशक थोड़ी ही, मगर सामाजिक समानता , राजनैतिक जनतंत्र और आर्थिक व्यव्हारिकता होनी चाहिए . यह पूर्व स्तिथि भारत में मौजूद नही रही है. दो चीज़ें ज़रूर होनी चाहिए १. गावों में धनिकों की सत्ता को तोड़ना और २. सरकार को आम जनता का औजार बनना चाहिए.”

इस प्रकार से , भूमि सुधार सिर्फ आंवटन क्षमता को बेहतर नहीं करता है , बल्कि कृषी क्षेत्र के विकास और जनतांत्रीकरण में पहला आवश्यक कदम है जो पूरे देश में उत्पादन शक्तियों के सतत और संतुलित विकास के लिए एक ज़रूरी शर्त भी है.

(उपरोक्त अंश “आस्पेक्ट्स ऑफ़ इंडियन इकॉनोमी” के ६६-६७ अंक में प्रकाशित लेख के हिंदी अनुवाद पर आधारित है. इसका मूल अनुवाद कारवां कलेक्टिव (karwan.collective@gmail.com) द्वारा किया गया है)

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