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पूजा प्रसाद | 6 MARCH, 2019

सरकार पर आदिवासियों का दबाव

सरकार पर आदिवासियों का दबाव


सर्दियों की बारिश में भिगते हुए, हाथों में छोटे छोटे पोस्टर लिए करीब हजार से भी ज्यादा लोगों का जत्था एक नारा दुहराते हुए मंडी हाउस से संसद मार्ग की तरफ बढ़ता जा रहा था। इस जत्थे में मुख्य रूप से आदिवासी , वन समुदाय और विश्वविद्यलय के छात्र शामिल थे। जो पोस्टर उन्होने पकड़े थे उनपर साफ लिखा था “जगल से आदिवासियों की बेदखली बंद करो, सुप्रीम कोर्ट के फेसले पर तुरंत अध्यादेश लाओ और आदिवासियों का शोषण बंद करो”।

दरअसल ये लोग हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे जिसमें जंगल से करीब दस लाख से अधिक आदिवासियों को बेदखल करने का फरमान जारी किया गया था। हालांकि बाद में खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही अपने फैसले पर स्टे लगा दिया है।

इस प्रदर्शन में शामिल लोगों की मुख्य मांगे थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर पुन समीक्षा कर जजमेंट अध्यादेश जारी किया जाए, आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी .वन अधिकारो की मान्यता अधिनियम 2006,को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए, जिन परिवारों के आवेदन को खारिज किये जा चुके है और सुप्रीम कोर्ट ने जिन्हें जंगल से बेदखल करने का आदेश दिया है उन्हें जमीन पर मालिकाना हक प्रदान करे और बेदखली पर रोक लगाई जाए, आदिम समुदायों जो अभी तक जमीन पर अपने मालिकाना हक का दावा नही कर पाए है सरकार उन्हें भी वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत मालिकाना हक और वन अधिकार प्रदान किया जाये और संविधान में प्रावधान अनुसूची 5 और 6 की प्रभावी तरीके से अमलवारी की जाये।

13 फरवरी के सुप्रीम कोर्ट के फैसले और अब अचानक उस फैसले पर ये स्टे आदिवासी समुदाय को गुमराह करने के अलावा कुछ काम नहीं कर रही है। फैसले में गांव सभाओं के निर्णयों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। अगर अगर यह फैसला लागू हुआ तो लाखों आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासियों को उनके गांवों और घरों से बेदखल होना पड़ेगा। ये मानवता और कानून के खिलाफ है। केंद्र सरकार ने निरस्त दावों की वापस जांच के आदेश दे रखे हैं। सरकार को या तो सुप्रीम कोर्ट में मामले की पुनर्विचार याचिका देकर सही पैरवी करनी चाहिए या इस संबंध में अध्यादेश लाना चाहिए ।

राजस्थान के उदयपुर जिले से आए पीपला गांव के नानालाल पिछले कई सालों से अपनी जमीन पर रह रहे हैं वह बताते हैं “जैसे ही उन्हें पता चला कि अब उन्हें अपना जंगल,जमीन और पानी छोड़ना पड़ेगा तो वह बहुत परेशान हो गए। उनका पूरा परिवार इस चिंता में पड़ गया कि वो अब क्या करेगा। परिवार ही नही बल्कि वो तमाम लोग जो उनकी बस्ती में रहते है सब कोर्ट के इस फैसले से परेशान है। आज इस मार्च में बस्ती के 20 से 25 लोग परिवार के एक एक सदस्य यहां इतनी दूर दिल्ली अपने हक के लिए बोलने के लिए आए हैं। अगर इस फैसले पर कुछ ठोस फैसला नही लिया जाएगा तो बस्ती के सभी लोग दिल्ली अपनी बात पहुंचाने दुबारा जरूर आएंगे”

वे आगे कहते हैं, “मेरे पिता और उनके पिता उसी जमीन पर रहते आए और आज मेरा परिवर भी वहीं रहता है। अगर हम यह साबित नहीं कर पाते कि हम वहां तीन पीढ़ियों से रहते हैं तो हमें हमारी जमीन,जंगल,पानी से एक झटके में बेदखल कर दिया जाऐगा। हम कहां जाएंगे? हमारी जमीन हमारे जंगल हमारे लिए जीवन व्यापन की व्यवस्था करते आए हैं अब वो व्यवस्था कौन करेगा?

नानालाल बहुत निराश होते हैं। कहते हैं, ''इस फैसले ने सब कुछ बिगाड़ दिया है। हम बस इंतजार कर रहे है कि सरकार कोई मजबूत फैसला ले। अगर सरकार न कोई ठोस फैसला नही लिया तो पूरी बस्ती उठकर यहां चली आएगी”। सरकार हमारी कोई मदद करने कभी नहीं आई और अब आई है तो सताने के अलावा और कुछ काम नहीं कर रही। हमारा घर खेत मकान सब हमारा जंगल है हम उसे कैसे छोड़ सकते हैं यह सरकार को समझना पड़ेगा।”

अहमदाबाद के मिलीसा गांव के 45 वर्ष के मीणालाल से हुई बातचीत में वे बताते है कि “हम आज सुबह सुबह यहां इतनी बारिश में पहुंचे हैं और सरकार को यह बताना चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को खारिज किया जाए। सरकार जमीन से हमें बेदखल करने की जो नीति बना रही है उसे नकारा जाए।

वह आगे कहते हैं “ हमें अभी बेदखल नहीं किया गया है पर बेदखली का डर हमें घेरे रहता है। हमारे इलाके में 100 से 150 सौ लोग हैं। जो यह कभी साबित नहीं कर पाएंगे कि वह जमीन उनकी है, तो क्या वह सभी लोग और उनके को यूँ ही छोड़ दिया जाएगा? क्या करेंगे वो सब क्या सरकार ने यह सोचा है।हम कही ना कही ये जानते है कि हमसे हमारी जमीन छीन कर उसे किसी पूंजीपति को सस्ते दामों में बेच दिया जाएगा और खूब मुनाफा कमाया जायेगा”।

वे आगे कहते है “हम जंगल में रहते हैं। हमारा जीवन जंगल से चलता है। वही हमारा पेट भरता है। अगर जंगल से हमें बाहर निकाला जाएगा तो हम किस तरफ जाएंगे हमें नहीं मालूम। शायद हमारा परिवार भी शहर की तरफ बढ़ेगा और किसी फ्लाईओवर के नीचे हमें अपना आगे का जीवन काटना पड़ेगा। हमें यहां घर तो मिलने से रहा तो किसी फ्लाईओवर के नीचे ही रहने को मजबुर होंगे। हमसे जंगल है और जंगल से हम हैं”।

मीणालाल बहुत मजबूत स्वर में कहते हैं, “सरकार का नया नारा तो यही लगता है “जंगल छोड़ो बहार निकलों” पर जंगल हम नहीं छोड़ेगे । हमारे बाप दादा वहां रहते हैं हम भी वही रहेगे ।हम हमारे जंगल के राजा हैं और राजा कभी भागा नही करते”।

इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में आदिवासी महिलायें भी शामिल हुई हैं। इनमें मध्यप्रदेश से कांति वैगा भी हैं। वे कहती हैं, “13 फरवरी को एक तुगलकी फरमान जारी किया गया। जिसमें यह कहा गया कि हमें अपने जल जंगल जमीन को खाली करना पड़ेगा। जिसे 21 राज्यों में लागू किया गया, और उसके बाद अचानक सरकार स्टे लेकर आती है। सरकार एकदम से जो स्टे लेकर आई है। उसमें उसका क्या फायदा है यह समझना बेहद जरूरी है। हम इस स्टे से खुश नहीं है। हमें अध्यादेश चाहिए जिसमें पांचवी अनुसूची को पूरी तरह लागू किया जाए। जमीनी तौर पर साथ ही आदिवासियों के बारे में सोच कर ही कुछ काम किया जाए। सरकार ने जो स्टे दिया गया है वह तो बस एक चुनावी जुमला है जो चुनाव खत्म होने के बाद सरकार भूल जाएगी। वह भूल जाएगी कि लाखों आदिवासी अपने जंगलों से अलग हो जायेंगे । वह भूल जाऐगे कि उनकी जमीन उनका पानी और उनकी मिट्टी उनके साथ नहीं रहेगी। वह भूल जाऐगे कि उन लाखों आदिवासियों का क्या होगा और वह अपना आगे का जीवन कैसे गुजारेगें”।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अगली सुनवाई दस जूलाई को करेगी। लेकिन फिलहाल देशभर में इस फैसले के खिलाफ विरोध शुरू हो चुका है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार अध्यादेश लाकर वन अधिकार की रक्षा करेगी या फिर चुनाव के बाद अपने वादे से मुकर जायेगी।

न्यूज़ सरोवर


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