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अनिल चमड़िया | 29 APRIL, 2019

जिग्नेश,कन्हैया,शेहला,ऋचा जैसे उभरे “राष्ट्रीय नेताओं” के नाम

जिग्नेश,कन्हैया,शेहला,ऋचा जैसे उभरे “राष्ट्रीय नेताओं” के नाम


मेरे प्रिय साथियों ,

क्या तुम लोगों ने एक मौका गंवा दिया ? इस सवाल के साथ यह पत्र मैं इसीलिए लिख रहा हूं कि दुखी हूं। देश के सामने जितनी बड़ी चुनौती बतायी जा रही है उस खतरे के मुकाबले चुनाव में तुम लोगों ने क्या किया ?

राजनीति का मैनस्ट्रीम

मेरे एक वरिष्ठ दोस्त ने देश की दो “राष्ट्रीय ”पार्टियों के चुनावी घोषणा पत्रों का तुलनात्मक विवरण भेजा है। एक यदि आंतरिक सुरक्षा के खतरे को रेखांकित करती है तो दूसरी राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती की भाषा में मध्य वर्ग के लोकतंत्र की पहरेदारी की जरूरत पर जोर दिया हैं। यदि मैं कहूं कि मुंबई में 2002 में मुझे राजस्थान के एक युवा दलित मिलें थे और मैंने उनसे पूछा कि दो “राष्ट्रीय ”पार्टियों के बीच वह अंतर को कैसे परिभाषित कर सकते हैं ? उनका जवाब था कि एक मारती है तो वह कंधे को सहला देती है । दूसरी मारती है तो मुंह बंद कर देती है और रोने भी नहीं देती ।

गौर करें तो देश में 1991 के बाद से दो तरह की प्रतिस्पर्धा की तरफ संसदीय राजनीति को ले जाया गया। एक है राजनीति के हिन्दुकरण ( हिन्दुत्व) और दूसरा है वैश्विक पूंजीवाद। हिन्दुकरण के पक्ष में खड़े होकर एक तरफ से आवाज लगाई जाती है कि नई आर्थिक नीति को जोर शोर से लागू नहीं करना राष्ट्रीय अहित है और दूसरा वैश्विक पूंजीवाद की तरफ से जवाब देता है कि राष्ट्रीय एकता के लिए हिन्दुकरण का स्थायी नारा अहितकर है। पूंजीवादीकरण और हिन्दुकरण की दोहरी प्रतिस्पर्धा का यह कमाल है कि वह भारतीय गणराज्य के संसदीय लोकतंत्र की प्रतिस्पर्धा का भ्रम लगता रहे। चुनावी घोषणा पत्रों को देखकर लगता है कि दोनों के बीच एक दूसरे की भाषा की अदला-बदली की सहज सुविधा हैं। एक विपक्ष में होती है तो वह पहले वाले विपक्ष की भाषा को उधार ले लेती है। हम उसमें अपने हित ढूंढने की कोशिश करते हैं। यही हमारे लिए लोकतंत्र हैं। पुडुचेरी में समुद्र के किनारे मुझे एक रुला देने वाला दृश्य देखने को मिला जिसमें एक छोटी उम्र की लड़की एक कूड़े दान ( डस्ट बीन ) के पास इस इंतजार में खड़ी थी कि कोई अपना झूठन फेंके और वह इस उम्मीद से दौड़कर झूठन को निकालती कि उस झूठन में चाटने लायक कुछ उसे मिल सके।

मीडिया पर नियंत्रण और पूंजी का केन्द्रीयकरण

मैं योजना आयोग के उपाध्यक्ष पी सी मोहाल नॉबीस की 25 फरवरी 1964 को तैयार हुई उस रिपोर्ट को पढ़ रहा था जिसमें यह बताया गया है कि कैसे देश की कुल आय कुछ परिवारों तक सिमटती जा रही है और उनका मीडिया पर भी नियंत्रण बरकरार है। यानी आजादी के केवल एक दर्जन साल के बाद कुल राष्ट्रीय संपत्ति पर कब्जा करने की रफ्तार तेज हो चुकी थी। और 2019 में उस रिपोर्ट को देख रहा था जिसमें यह बताया गया है कि देश के कुल 1 फीसदी अमीरों के देश की कुल संपत्ति का 73 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सिमट चुका है। यानी हिन्दू करण और पूंजीवादी करण दोनों का विस्तार होता चला गया है। इसकी खूबसूरती यह है कि उसमें जातीय और लैंगिग वर्चस्व भी कायम है। संसदीय स्वतंत्रता के विकास की हालत यह है कि देश के कुछ ही करोड़पति परिवार चुनाव लड़ सकते हैं। संसदीय प्रतिस्पर्धा के लिए चुनाव खर्च के वास्ते कम से कम 70 लाख के जुगाड़ में लगना ही विपक्ष में होने की पहचान है।

इस सबके बीच यह भर हुआ है कि चुनाव के लिए गैर कांग्रेस वाद से शुरु हुई यात्रा गैर भाजपा तक पहुंची है और नई भाषा में दोनों एक दूसरे से मुक्ति की युगल बंदी कर रहे हैं।

एक अजीब सी गुत्थी है यह। हम जो करना चाहते हैं और जो नहीं होते देखना चाहते हैं, उसके परिणाम उलटकर हमारे सामने 56 इंच के सीने के साथ खड़े हो जाते हैं।

सत्ताधारी बनने के लिए कितने वोट चाहिए

2014 के चुनाव में जो पार्टी सत्ताधारी बनी उसने कुल 31 फीसदी वोट प्राप्त किए थे। 31 फीसदी के आंकड़े को देखकर यह भ्रम होता है कि सत्ताधारी पार्टी को देश के लगभग एक तिहाई लोगों का समर्थन प्राप्त हैं। लेकिन सत्ता हासिल करने वाली पार्टी के साथ यह सबसे बड़ा झूठ जुड़ा था । 2014 में कुल मतदाताओं की संख्या 83.40 करोड़ थी और उनमें 543 सीटो के लिए 66.44 फीसदी मतदाताओं ने ही अपना वोट दिया था। यानी 55 करोड़ 41 मतदाताओं ( 554109600 ) ने मतदान किया और उसका 31 फीसदी यानी 17 करोड़ 17 लाख (171773976) मतदाताओं ने सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में मतदान किया। 17 करोड़ 17 लाख का मतलब देश की पूरी आबादी का केवल 12 फीसदी होता है। इस समय देश की कुल आबादी 1,350,334,544 (1.35 अरब ) है।

इस अल्पमत की सत्ता को बनाए रखने के लिए क्या-क्या किया जा सकता है और किस-किस रुप में उपस्थित है , एक चक्रव्यूह की तरह मेरे सामने दिखाई देता है।

एक स्थिति बहुत साफ-साफ दिखती है कि वोट के लिए लोकतंत्र और लोकतंत्र को चलाने के लिए सैन्य तंत्र लगातार मजबूत हो रहा है। चुनावी घोषणा पत्रों में भी सैन्य करण के ढांचे के मजबूत होने के फैसले दिखने को मिल रहे हैं। उदार लोकतंत्र के लिए पूंजीवादी करण, सैन्य करण और हिन्दू करण की तीन अनिवार्य शर्तें लगा दी गई है।

मैं यह कह सकता हूं कि कई पार्टियों वाले संसदीय लोकतंत्र का खात्मा हो चुका है । आज हम एक राजनीति की कई पार्टियों वाले लोकतंत्र के बीच में खड़े हैं। और यह कथित प्रतिस्पर्धा की आंख मिंचौली का खेल हम देखते रहे हैं।

नई तकनीक और पैसे की ताकत की साझेदारी

तुम लोगों में से ज्यादातर को “राष्ट्रीय ” स्तर का नेता बनने में नई तकनीक (टेक्नॉलॉजी) की बड़ी भूमिका है। मैं यह कह सकता हूं कि प्रतिस्पर्धा में दिखने के लिए यह टेक्नॉलॉजी एक नया मैदान बना है। इतना बड़ा मैदान, अखाड़ा, स्टेडियम बना है कि 2014 के चुनाव में 30000 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे जो कि देश में हुए अब तक के चुनाव में सबसे ज्यादा खर्चीला चुनाव था और चुनावी सिद्दांत के मुताबिक उसका पांच वर्षों में दुगना होने का अनुमान है।

एक साफ गणित है कि सत्ताधारी बनने के लिए आबादी के 12 फीसदी वोट को प्रभावित, आकर्षित, भयभीत करने और असुरक्षित महसूस कराने के साथ 88 फीसदी वोट के भीतर सेंधमारी करने की संस्कृति पैदा करनी होती है। देश के लगभग 200 जिंदा कार्यकर्ताओं ने एक पत्र जारी किया है जिससे चुनाव में सत्ताधारी बनने के गणित को समझने में मदद करता है।

वे लिखते है देश में 30 करोड़ से ज्यादा स्मार्टफोन उपभोक्ता हैं। उनके लिए गूगल तथा फेसबुक की एल्गोरिद्मों से ही तय होता है कि वे अपनी फेसबुक फीड्स में और गूगल सर्चो में क्या देखेंगे या अपनी यूटय़ूब फीड्स में, गूगल पर, व्हाट्सएप मैसेजिंग में तथा फेसबुक पर क्या देखेंगे? गूगल, फेसबुक तथा ट्विटर जैसे डिजिटल प्लेटफार्मो में यह सामर्य हैं कि वे बड़े पैमाने पर लोगों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं और इस तरह लोकतंत्र के लिए होने वाले चुनावों को भी प्रभावित कर सकते हैं। पत्र के ही अनुसार स्वतंत्र शोधार्थियों ने इन प्लेटफार्मो के प्रभाव का विश्लेषण कर यह निष्कर्ष निकाला है कि इन प्लेटफार्मो के जरिए लोगों को जो परोसा जाता है, मिसाल के तौर पर वे अपने फेसबुक पेजों पर या गूगल सर्च के जरिए जो कुछ देखते हैं, उसे थोड़ा सा घुमाने भर के जरिए चुनाव नतीजों में महत्त्वपूर्ण बदलाव लाया जा सकता है। यह अनिर्णीत मतदाताओं का 20 फीसदी या कुल मतदाताओं के 4-5 फीसदी का मन बदला जा सकता है । यानी बारह फीसदी वोट के बूते सत्ता पर काबिज होने की योजना में यह संख्या इतनी महत्वपूर्ण है कि मौजूदा चुनाव व्यवस्था में कोई राजनीतिक पार्टी झाडू मार जीत हासिल कर सकती है। यानी जिस पार्टी के पास पैसे की ताकत है वह इन डिजिटल प्लेटफार्मो का सहारा लेकर आराम से बड़े पैमाने पर मतदाताओं को अपने पक्ष में मोड़ सकती है।दुनिया भर के कई देशों में यह खेल देखा गया है। निष्कर्ष है पैसे का इस्तेमाल कर डिजिटल प्लेटफार्मो के जरिए दौलत वालों की आवाज को कई गुना बढ़ाया जाता है।

इसे इस रुप में हम सूत्रबद्ध कर सकते है कि विज्ञापनों के जरिए मतदाताओं के बीच पार्टियों तथा उम्मीदवारों को उसी तरह से बेचा जा सकता है, जैसे ग्राहकों को दूसरी चीजें बेची जाती हैं।

लोकतंत्र के हम नागरिक नहीं बल्कि लोकतंत्र के हम ग्राहक हो गए हैं। चुनाव प्रचार में मतदाताओं को ये कहा जाता है कि आप जितना लोकतंत्र खरीदना चाहते है , दिए गए विकल्प में खरीददारी कर लें।

आईने में तुम्हारा चेहरा कैसा दिखता है

तुम “राष्ट्रीय” स्तर के नेताओं की ताकत डिजिटल तकनीक है और तुम चुनाव के साथ इस तकनीक के मैदान में भी प्रतिस्पर्द्धी दिखने की कोशिश कर रहे हो।

यानी जिस पहलवान का अखाड़ा है उसमें अपनी किस्मत की जोर आजमाईश करने वाले सिकिया पहलवान दिखते हो। मजाकिया लहजा में मेरे दोस्त कह रहे हैं कि अंकल फेकूं के भतीजे और भतीजियां लग रहे हैं।

तुम लोगों को ये पता होगा कि चुनाव आयोग के अनुसार 2014 की तुलना में 8 करोड़ चालीस लाख नये मतदाता जुड़े है और उनमें एक करोड़ पचास लाख मतदाता 18 और 19 के बीच की उम्र के हैं। ये कुल मतदाताओं का 1.66 फीसदी है।

इन्हें तुमने कैसे संबोधित किया ? किस संसदीय क्षेत्र में खड़े होकर किया? किस उम्मीदवार के पक्ष में चुनाव प्रचार करते हुए किया?

विज्ञान के लोगों के पास मनोरंजन के लिए विज्ञान की शब्दावली होती है। उसी तरह से राजनीति में मनोरंजन करने का भी बड़ा स्कोप इन दिनों बना है और उस मनोरंजन से गूंजने की हद तक तालियों की आवाज सुनी जा सकती है। राजनीति में मनोरंजन की संस्कृति बहुत खतरनाक होती है और तालियों की गड़गड़ाहट सुनने का मजा एक खतरनाक नशे की तरह होता है।

मैं इंडियन एक्सप्रेस में एक राजनीतिक विज्ञानी से बातचीत पढ़ रहा था। इसमें उन्होने बताया कि 2004 में भारतीय जनता पार्टी के वोटरों के बीच एक सर्वे किया गया उसमें केवल छह फीसदी वोटरों ने जवाब दिया कि वे भारतीय जनता पार्टी के लिए वोट नहीं करेंगे यदि अटल बिहारी वाजपेयी को उम्मीदवार नहीं बनाया गया। जब 2014 में एक सर्वेक्षण किया गया तो 25 फीसदी ने ये जवाब दिया कि नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर भाजपा के पक्ष में मतदान किया है। 1970 के दशक में इंदिरा गांधी की करिश्माई संस्कृति नरेन्द्र मोदी तक किस रुप में बढ़ी है इसे हम समझ सकते हैं।

राजनीति में विकृतियों से भरी संस्कृति केवल सत्ता की राजनीति को ही ग्रसित नहीं करती है बल्कि उसकी शिकार उसके विपक्ष की राजनीति भी होती है। उसके सामने एक नई संस्कृति को विकसित करने की चुनौती होती है । आजादी का अर्थ संपूर्णता में है । राजनीति में व्यक्ति करिश्माई से भी आजादी का नारा लगना चाहिए।

डा. भीम राव अम्बेडकर कहते हैं कि सामाजिक क्रांति के बिना राजनीतिक क्रांति अधूरी है। यह सही साबित हुआ है। सत्ता केवल सरकार नहीं होती है।उसका नीचे से ऊपर तक एक ढांचा निर्मित हैं।

मैं एक किस्सा सुनाता हूं। मैं जामिया मीलिया इस्लामिया में पत्रकारिता के छात्र छात्राओं से पढ़ने -पढ़ाने गया था। उस कक्षा में शायद ही कोई होगा जिसने कि मेन-स्ट्रीम कहे जाने वाले मीडिया कंपनियों की भूमिका की आलोचना नहीं की। लेकिन विडंबना यह है कि लगभग सबके सब उन्हीं संस्थानों में नौकरियों के लिए गला काट प्रतियोगिता में लगना चाहते थे। उनमें से सब के सब कंपनियों की पत्रकारिता ही करना चाहते थे। इस तरह का अंतर्विरोध हर जगह दिखाई दे रहा है। उनका जोश इतना तक जरूर था कि वे ठहरे हुए पानी में एक कंकड़ फेंकने का मजा लेना चाहते थे। उनमें से कोई पानी के निकास के लिए योजना बनाने और उसकी जगह बनाने का श्रम नहीं करना चाहता था।

हालात यह हो गई है कि राजनीतिक पार्टियां तमाम तरह की घटनाओं के बीच अपनी प्रतिक्रिया के लिए घटनाओं का चयन करती है। घटनाएं रोकना उनके वश में नहीं। होने वाली अप्रत्याशित घटनाओं के जो कारण मौजूद है उन्हें दूर करने के लिए अपनी भूमिका की जरूरत ही वे महसूस नहीं करती है। वे इस इंतजार में रहती है कि सत्ता के एक किरदार से नाराजगी बढ़े तो वे अपना चेहरा सामने कर दें और मतदाताओं के सामने उनकी विज्ञापित सामग्री को खरीदने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं हो। विकल्प हीनता इनके अस्तित्व का हिस्सा है।

अपना आईना तैयार करो दोस्तों

मैंने तुम लोगों को यह पत्र लिखने से पहले एक लड़की से बात की। वह जे एन यू में पढ़ती है। खुले दिमाग की है और आगे के बारे में सोचती हैं। उसने कहा कि देश में जो नई पीढ़ी के नेता उभरे हैं उन्हें देश के युवाओं को संबोधित करने का अभियान चलाना चाहिए। एक लंबी रेखा खिंचने की कोशिश में लगना चाहिए था और है।

पिछले चार पांच वर्षों में मैंने तुम लोगों को बड़े होते देखा है । तुम्हारे साहस का ग्वाह रहा हूं। तुम्हारे सामाजिक सरोकारों में दिन ब दिन कुछ न कुछ घटते बढ़ते देखता रहा हूं। इस बात को समझने की जरूरत है कि तुम चुनावी ब्रांड के चुनावी बॉड़ नहीं हो।

भविष्य तुम लोगों की राह देख रहा है। सोशल मीडिया में लाइक, कॉमेंट, शेयर का फॉरमेट तुम्हें किसी किनारे बैठाने के लिए नहीं है। इस गिनती में व्यस्त रखने के लिए नहीं है कि किसे कितने लोगों ने देखा। वह हिस्सेदारी के वास्तविक विस्तार की अपेक्षा के चिन्ह हैं ।

मेरे दोस्तों घटनाओं ने तुम्हें लंबी रेखा खिंचने के लिए तैयार किया है। एक अवसर दिया है। कम से कम पांच सालों तक लगातार अभियान चलाकार उस एक मात्र संसदीय क्षेत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बुनियादी मुद्दों को स्थापित करो जिसका नाम भारत और हिन्दोस्तां है।

तुम सभी का

अनिल चमड़िया

न्यूज़ सरोवर


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