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विवेकानंद माथने | 30 MARCH, 2019

हम विकास को नकारते है।

विवेकानंद माथने


क्या आप जानते है कि आज देश में जो विकास किया जा रहा है उसकी देश और दुनिया के लोगों को बडी कीमत चुकानी पडेगी। देश की लगभग आधी से ज्यादा आबादी से उनका जीने का साधन, उनका रोजगार छीना जायेगा, उनके आवास, उनके गांव तबाह किये जायेंगे और उनको मौत या मौत से भी बदतर जीवन जीने के लिये मजबूर किया जायेगा। और वह विकास के लाभार्थी जो अपने आपको भाग्यशाली कहते हुये विकास का समर्थन करते नही थकते, क्या वह जानते है कि आधुनिक विकास ने सृष्टि के प्रकृति चक्र को तोडा है और जिससे पृथ्वी के अस्तित्व को ही संकट पैदा हुआ है। पर्यावरण को अपरिवर्तनीय क्षति पहुंची है। जलवायु परिवर्तन, तापमान वृद्धि, प्रदुषण और प्राकृतिक आपदाओं के कारण सबको भयंकर परिणामों का सामना करना पडेगा। तब वह विकासवादी भी प्राकृतिक आपदाओं से होनेवाली तबाही से नही बच सकेंगे। अगर आप यह समझ रहे है तो फिर पूरी विकास नीति पर आज पुनर्विचार करते हुये हिम्मत से कहना होगा कि हां, हम विकास का विरोध करते है। हम विकास को नकारते है। जीना है तो इस विकास को नकारना ही होगा।

आज पूरे देश में इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, रेल कॉरिडोर, इंडस्ट्रियल झोन, व्यापारिक झोन बनाये जा रहे है। कारपोरेट खेती, रियल इस्टेट को बढावा दिया जा रहा है। रेल, हवाई, जल परिवहन की विशेष सुविधाएं निर्माण की जा रही है। बडे बांध बनाने और नदियां जोडने का काम किया जा रहा है। जल मार्ग के लिये समुंदर व नदियां बांधी जा रही है। मेट्रो, पोर्ट, सीमेंट की सडके और पुल बनाये जा रहे है। घरों में इस्तेमाल के लिये विलासिता के सामान, खानपान की लग्जरी सेवाएं, लग्जरी वाहनों, नई कारों आदि का उत्पादन बढाया जा रहा है। मॉल, शॉपिंग सेंटर, होटल का निर्माण किया जा रहा है। प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध स्थानों, धार्मिक स्थानों को पर्यटन केंद्र में परिवर्तित किया जा रहा है।

इस समय देश में 6749 किलोमीटर लंबाई के 6 इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनाये जा रहे है। जिसमें पोर्ट, एअर पोर्ट, सडके, रेलमार्ग, इंडस्ट्रियल झोन, नये स्मार्ट शहर बनाये जायेंगे। रेल्वे के 10122 किलोमिटर लंबाई के 6 डेडिकेटेड फ्रेट कारिडोर बनाये जा रहे। रियल इस्टेट में नये शहर, 100 स्मार्ट शहर, शहरों में स्मार्ट बस्तियां खडी की जा रही है। पूरे देश में प्रतिदिन 27 किमी की गति से सीमेंट सडकों का जाल बिछाया जा रहा है। कारपोरेट खेती के लिये खेती कंपनियों को सौंपी जा रही है। खदानें, बांध, स्टील, ऊर्जा आदि परियोजनाओं का निर्माण किया जा रहा है। नदियों और बांधों का पानी उद्योगों को हस्तांतरित किया जा रहा है। लकडियों के लिये जंगल कटाई हो रही है। खनिज संपदा का बडी मात्रा में दोहन किया जा रहा है।

एक अनुमान के अनुसार अबतक ग्रामीण भारत की लगभग 4.8 करोड हेक्टर जमीन कम हुई है। यह जमीन गैरकृषि कार्य के लिये कारपोरेट घरानों, बिल्डरों या फिर खेती के लिये गैरकिसान शहरी धनवानों के पास गई है। प्रतिवर्ष लगभग देश में उत्पादित या आयातीत 800 मिलियन कोयला जलाया जाता है। प्रतिवर्ष 208 मिलियन टन स्टील और कच्चे इस्पात, 500 मिलियन टन सीमेंट का उत्पादन किया जा रहा है। हजारों टन लकडियां जंगल से काटी जाती है। यह अनुमान है कि विकास योजनाओं के लिये लगभग 4 करोड हेक्टर जमीन, 80 बिलियन क्युबिक मीटर पानी, 7 लाख मेगावैट बिजली की आवश्यकता होगी। कोयला, सीमेंट और अन्य चीजों का उत्पादन भी उसी अनुपात में बढेगा।

हाऊसिंग, कंस्ट्रक्शन, इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, पावर जनरेशन आदि सभी विकास कामों के लिये प्रतिवर्ष जमीन, पानी, लकडियां, लोहा, सीमेँट, कोयला, खनिज, गौण खनिज और पर्यावरण आदी की बडे पैमाने में जरुरत पडेगी। यह सारी चीजे आसमान से नही टपकती। बल्कि उन लोगों से छीन ली जायेगी जिनका उसपर अधिकार है और जिनके जीवन का आधार है। यह सब करोडो किसानों, आदिवासियों, ग्रामीणों को कारपोरेट के हातों बलि चढाकर ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिये करोडो लोगों और हजारों गावों के अधिकार छीने जायेंगे।

खेती, उद्योग, व्यापार, सेवाऐं सब कारपोरेट को सौपा जा रहा है। प्राकृतिक संसाधनों से समाज का हक छीनकर उसे कारपोरेट्स को हस्तांतरण के लिये साजिशपूर्ण तरीके से कानूनन वैधता प्रदान की गई है। मेक इन इंडिया के तहत देशी विदेशी कारपोरेट कंपनियों को विकास का काम सौंप कर उन्हे अनेक सहूलियते दी जा रही है। पिछले दस सालों में टैक्स में 55 लाख करोड रुपये की छूट कंपनियों को दी गई है। बैंको का 12 लाख करोड में से अबतक 3.5 लाख करोड का कर्ज कारपोरेट्स को माफ किया गया है। रिअल इस्टेट को बढावा देने के लिये जीएसटी के रेट कम किये गये है।

वर्तमान सरकार के सीमेंट मैन का बस चले तो वह पूरी पृथ्वी पर सीमेंट की मोटी परत बिछा देंगे। वह प्रतिदिन 47 किलोमीटर की गति से एक से डेढ फुट मोटी सडकें बनाना चाहते है। जल मार्ग के लिये नदियां, बांध, समुद्र किनारों को भी सीमेंट से बांध देना चाहते हैं। वह बताते है कि अबतक लगभग 37 लाख करोड का निवेश किया जा चुका है। रिअल इस्टेट में कारपोरेट्स ने 7 लाख करोड रुपये के निवेश की घोषणा की है। लेकिन वह ये नही बताते कि अगर कंस्ट्रक्शन के सारे काम टेंडर राशि के केवल 50 से 60 प्रतिशत कीमत में पूरे होते है तो फिर बाकी राशि कहां जाती है।

विकास से प्राप्त सारी सुविधाएं अगर सभी के लिये संभव होती और इससे पृथ्वी पर किसी प्रकारका बोझ न पडता तो इसे सहर्ष स्वीकार किया जा सकता था। लेकिन यह सबके लिये संभव नही है। पृथ्वी में इतनी क्षमता नही है कि वह सबकी भौतिक महत्वाकांक्षा को पूरा कर सके। थोडे लोगों के भौतिक सुख के लिये अधिकांश लोगों को बली चढाना विकास नही कहा जा सकता।

आधुनिक विकास दुनिया में अमीरों का अजेंडा है जो खुद को दुनिया के मालिक और बाकी सभी लोगों को गुलाम मानते है। अपनी राक्षसी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिये अमीरों ने दुनिया के एक तबके को लाभार्थी बनाकर लूट में शामिल किया है। वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के बाद दुनिया में जिस तेजीसे आर्थिक व्यवस्था में बदलाव आये है उससे सकल घरेलू उत्पाद में बढोतरी के बावजूद गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, भुखमरी बढी है। आर्थिक गैरबराबरी चरम सीमा पर पहुंची है। देश में जो संपत्ति पैदा हुई है उसका 75 प्रतिशत लाभ देश दुनिया के केवल एक प्रतिशत अमीरों और उनके लिये काम करनेवाले उनके गुलामों को ही मिला है। जबकी दुनिया की आधी आबादी जीने के लिये तरस रही है। पूरी दुनिया इसके विरुद्ध आक्रोशित है।

कारपोरेटी विकास हिंसा पर आधारित है। कारपोरेट उपनिवेशवाद के नये दौर में हर देश में अमीर और गरीब देश पैदा किये जा रहे है। सस्ते श्रम और प्राकृतिक संसाधन से प्राप्त संपत्ति कार्पोरेट घरानों द्वारा लूटी जा रही है। एक विशिष्ट उपभोक्ता वर्ग खडा कर उनकी क्रयशक्ति बढाने के लिये उनके वेतन बढाये जाते है और उसके लिये आधी आबादी के अधिकार कुचल दिये जाते है जिससे समाज में आर्थिक गैरबराबरी बढती जा रही है।

जब किसानों और श्रमिकों को बलि दिया जाता है तब छोटे दुकानदार, व्यापारी और उद्योजक उसका समर्थन करते है और कहते है कि सरकार तो किसी को फोकट नही खिलाना चाहिये। लेकिन उन्हें ध्यान रखना चाहिये कि पडोस में लगी आग तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक दे रही है और अभी तुम नही संभले तो किसान मजदूर कम से कम संघर्ष कर रहे है। तुम तो संघर्ष करने के स्थिति में भी नही रहोगे। मॉल, शॉपिंग सेंटर और व्यापार के सभी क्षेत्र में कारपोरेट का प्रवेश आपका भी रोजगार छीननेवाला है। इसलिये उनका साथ दीजिये जो इस समय चक्की में पिसे जा रहे है।

विकास योजनाओं से बडे पैमाने पर रोजगार पैदा होने का दावा सही साबित नही हुआ। जितने लोगों को रोजगार मिला है उससे कई गुना अधिक हाथों का काम छीना गया है। अबतक यंत्रों के उपयोग ने श्रमिकों का रोजगार छीना है। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता बुद्धिजीवियों के रोजगार छीनने की तैयारी कर रही है। इसलिये अब तो बुद्धिजीवियों तुम्हे भी सावधान होने की जरुरत है।

आजादी आंदोलन में कौन किसके साथ खडा था यह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है। अब जब वर्तमान इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा तब विकासवादियों के लिये यह लिखा जायेगा कि जब देश कारपोरेटी लूट के खिलाफ संघर्ष कर रहा था तब वह दुनिया के लूटेरें कारपोरेट घरानों और अमीरों के साथ खडे थे।

लोकतंत्र में जनता से मत पाकर सरकारें बनती है। इसलिये अगर आप विकास को मत देते है तो मान लीजिये की आप अपने तबाही को अनुमति दे रहे है। विकास को मत का अर्थ है अपने खुद और परिवार के लिये अपने ही हाथों कबर खोदना। तब आप खुद के लिये रोने का अधिकार गवां चुके होंगे।

हम क्या करें? हम अपने से शुरुवात करें। याद रखिये जो आपके लिये जरुरी है वह दुनिया के हर व्यक्ति के लिये जरुरी है। इसलिये अपनी आवश्यकताओं को कम करे। सादा जीवन अपनाये। बिजली का उपयोग कम से कम करे। घर छोटा रखे और एक से काम चल रहा हो तो घर को लग्जरी सामानों से ना भरे। सार्वजनिक वाहनों का इस्तेमाल करें। पेड लगाईये। पानी बेचने का विरोध करे। कृषि भूमि का गैर कृषि कार्य के लिये इस्तेमाल रोकिये। फॉरेस्ट विभागों को अमीरों के लिये पेड काटने से रोकिये। कारपोरेट्स को लाभ पहुंचाने वाले खदानों, बडे बांधो के निर्माण का विरोध करे। इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण का विरोध करे। जमीन को सीमेंट से ढकने से रोकिये। धार्मिक स्थानों को पर्यटकों का उपभोग केंद्र न बनने दे। पर्यावरण रक्षा और विकास का समर्थन एक साथ संभव नही है। इसलिये पूरे कारपोरेटी विकास का विरोध करे। हमे समझना होगा कि औद्योगिकरण और यांत्रिकीकरण के अलावा भी आगे बढा जा सकता है। हमें विकास पूरी अवधरणा पर पुनर्विचार करना चाहिये। विकल्पों की तलाश करनी चाहिये।
 

न्यूज़ सरोवर


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