पूरा हिसाब लगाएं तो हिंदुत्व की गोली खा कर गिरते वक्त बापू की उम्र थी 78 साल 3 माह 28 दिन थी। तारीख थी 30 जनवरी 1948; समय था संध्या 5.17 मिनट। स्थान था नई दिल्ली का बिड़ला भवन। हिंदुत्ववादी संगठनों की तरफ से गांधीजी की हत्या करने की 5 असफल कोशिशों के बाद, जिनमें से अधिकांश में नाथूराम गोडसे को शामिल किया गया था, यह 6 ठा प्रयास था जिसके लिए 9 गोलियां खरीदी गई थीं और खरीदी गई थी एक बेरेट्टा एम 1934 सेमी अॉटोमेटिक पिस्तौल। यही पिस्तौल ले कर नाथूराम गोडसे महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा में आ या था। उसे निर्देश सीधा दिया गया था : भारतीय समाज पर महात्मा गांधी के बढ़ते प्रभाव को रोकने की हमारी हर कोशिश विफल होती जा रही है। अब एक ही रास्ता बचा है - उनकी शारीरिक हत्या !

गांधी का अपराध क्या है ? बस इतना कि हिंदुत्ववादी भारतीय समाज की जिस अवधारणा में मानते हैं गांधी उससे किसी भी तरह सहमत नहीं हैं। वे हिंदुत्ववादियों से - और उस अर्थ में सभी तरह के धार्मिक-सामाजिक कठमुल्लों से - असहमत ही नहीं हैं बल्कि पूरी सक्रियता से अपनी असहमति जाहिर भी करते हैं और भारतीय समाज की अपनी अवधारणा को जनता के बीच रखते भी हैं। असहमति आजादी और लोकतंत्र का प्राण-तत्व है। असहमति के कारण किसी की जान नहीं ली जाएगी, यह वह आ धार है जिस पर लोकतंत्र का भवन खड़ा होता है। लेकिन असहमति कठमुल्लों की जड़ों पर कुठाराघात करती है। कोई 80 साल के निहत्थे बूढ़े गांधी पर छिप कर गोलियां बरसाते हिंदुत्ववादियों के हाथ नहीं कांपे क्योंकि उनके सपनों के समाज में असहमत की कोई जगह न थी और न है।

यह सारा इतिहास कुछ याद यूं आ रहा है कि हम और दुनिया आ ज महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रही है। इतिहास वह आ ईना है कि जिसमें सभ्यता अपना चेहरा देखती है। मैं उसमें गांधी को देखता हूं और खुद से पूछता हूं कि 150 साल का आ दमी होता भी तो कितने काम का होता ? और यहां आ लम यह है कि इस 150 साल के आ दमी से ही हम सारे कामों की उम्मीद लगाए सालों से बैठे हैं ! सारी दुनिया का चक्कर लगा कर हम लौटते हैं और कहते हैं कि हमें लौटना तो गांधी की तरफ ही होगा। ऐसा कहने वालों में सभी शामिल हैं - नोबल पुरस्कार प्राप्त वे दर्जन भर से ज्यादा वैज्ञानिक भी जिन्होंने संयुक्त वक्तव्य जारी किया है कि अगर मानवता को बचना है तो उसे गांधी का रास्ता ही पकड़ना होगा; मार्टीन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला और अोबामा जैसे लोग भी जो कहते हैं कि न्याय की लड़ाई में वंचितों- शोषितों के पास लड़ने का एकमात्र प्रभावी नैतिक हथियार गांधी का सत्याग्रह ही है; भौतिकविद् हॉकिंग्स जैसे वैज्ञानिक भी हैं जो जाते-जाते कह गये कि विकास की जिस दिशा में दुनिया ले जाई जा रही है उसमें मानव जाति का संपूर्ण विनाश हो जाएगा और तब कोई नया ही प्राणी, नये ही किसी ग्रह पर जीवन का रूप गढ़ेगा; चे ग्वेवेरा जैसे गुर्रिल्ला युद्ध-सैनिक भी हैं जो राजघाट की समाधि पर सर झुकाते वक्त यह कबूल करता है कि वहां, क्यूबा में, उसकी पीढ़ी को पता ही नहीं था कि लड़ाई का यह भी एक रास्ता है; ‘त्रिकाल-संध्या’ लिखने वाले भवानीप्रसाद मिश्र सरीखे कवि भी हैं जो कविता में, कविता को जितना टटोलते हैं, गांधी ही उनके हाथ आ ता है; और 30 जनवरी मार्ग पर स्थित बिड़ला भवन में गांधी से किसी हद तक अनजान वह कोई लड़की भी है जो यह सुन-समझ कर फूट कर रो पड़ती है कि 80 साल के आ दमी को हमने यूं मार डाला कि वह हमसे या हम उससे सहमत नहीं थे। बोली आंसू में डूबती आ वाज में बोली थी: “ यह तो पाप हुआ !” इन लोगों या इन प्रसंगों से गांधी की महानता साबित करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। महानता व्यक्ति की होती है तो वह व्यक्ति के साथ ही चली जाती है। इतिहास के पन्ने पलटेंगे हम तो उसके हर पन्ने से चिपका एक-न-एक महान व्यक्ति मिलेगा ही। लेकिन वह उस पन्ने के बाहर कहीं नहीं मिलेगा। 30 जनवरी 1948 को जिस नाथूराम गोडसे ने, पर्दे के पीछे छिपे कई नाथूरामों की शह पर गांधी को तीन गोलियों से धराशायी किया, सोचा तो उसने भी यही था कि वह इतिहास के एक पन्ने से गांधी को चिपका कर छोड़ देगा कि कहानी खत्म ! लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जिस बूढ़ी, कमजोर काया को मारना था उसके लिए तो एक ही गोली काफी थी। दो नाहक ही बर्बाद की उसने। लेकिन जो मारा नहीं जा सका वह कितनी भी गोलियों से मारा नहीं जा सकता है क्योंकि वह सत्यं-शिवम्-सुंदरम् की मानव जाति की वह अभीप्सा है जो न वृद्ध होती है, न मृत !

कभी वे चाहते थे कि वे 125 साल जीएं ताकि मानव-जाति की उतनी सेवा कर सकें जितनी वे चाहते हैं। अपना शरीर उसी तरह साधा था उन्होंने। वे घात-प्रतिघात के किसी खेल में शामिल नहीं थे लेकिन गहन आ वेग से भरे थे। उन्हें वह सब यहीं, इसी धरा पर, इसी जीवन में चाहिए था जिसकी साधना या खोज में साधक गुफाओं-जंगलों की खाक छानते फिरते हैं। किसी ने थोड़े व्यंग्य से और थोड़ी नाराजगी से गुफा जाने की सलाह दी थी तो उन्होंने कहा था कि जाऊं कहां, मैं तो अपनी गुफा साथ लिये फिरता हूं। उनकी दौड़ बहुत थी और बहुत तेज थी। लोग भी और वक्त भी उनके साथ दौड़-दौड़ कर हार जाता था। अपने शरीर-यंत्र पर ऐसा काबू और अपनी आवश्यकताओं पर ऐसा नियंत्रण जमाने ने देखा नहीं था। और खास यह कि उनकी यह सारी साधना निजी मुक्ति या उपलब्धि के लिए नहीं थी। वे तो बैकुंठ भी सबके साथ ही जाना चाहते थे। दक्षिण अफ्रीका में अपनी साधना के पंख फड़फड़ाते मोहनदास करमचंद गांधी को टॉल्सटॉय ने इसीलिए पहचाना था और अपने मित्र को लिखा था कि यह आ दमी तुमुल कोलाहल के बीच बैठ कर साधना की सिद्धि तक पहुंचने में लगा है और इसलिए हमें इस पर नजर रखनी चाहिए। भौतिकता के शिखर पर बैठे अमरीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति अोबामा की हसरत थी कि काश वे गांधी से यह पूछ व जान सकते कि आ खिर आ दमी इतने कम संसाधनों में कैसे सार्थक जीवन जी सकता है। विनोबा को हिमालय की शांति और बंगाल की क्रांति का संगम साबरमती में मिला तो उनकी खोज विराम पा गई; जयप्रकाश मार्क्सवादी दर्शन के सारे पन्ने खंगाल कर भी जिस गुत्थी को सुलझा नहीं पा रहे थे उसे गांधी ने ऐसे सुलझा दिया कि वे फिर कभी न उलझे, न ठिठके।

लेकिन हम आ ज उलझे भी हैं और ठिठके भी हैं। आ जादी के 72 साल होते, न होते भारतीय समाज अपनी आ तरिक संरचना के बोझ से दबा लड़खड़ा रहा है। लोकतंत्र का ढांचा तो है लेकिन तंत्र किसी पौराणिक राक्षस की तरह सब कुछ लील जाने पर आ मादा है और अनगिनत लोगों के लिए जीवन में सम्मान, समता और स्वतंत्रता की कोई सुगंध बची नहीं है। सत्ता की छीना-झपटी में सब यह भूल ही गये हैं कि वह भारतीय समाज है जिसकी पीठ पर यह धमा-चौकड़ी चल रही है। हममें से कुछ हैं जो अपनी सुविधा देख कर, कभी इसके लिए तो कभी उसके लिए तालियां बजाते हैं। अधिकांश हैं कि जो जीने के ऐसे दारुण संघर्ष में घिरे हैं कि जीवन की सुध ही रह गई है। हमारा समाज पामाल हो रहा है। सांप्रदायिकता, जातीयता, दरिद्रता, जहालत, आ लसीपना, अशिक्षा और कुशिक्षा, गर्दन झुका कर सब कुछ सह जाने की निरुपायता - यही सब तो था कि जिसने बैरिस्टर मोहनदास को बगावत के लिए मजबूर कर दिया था ।

गांधी:150 गांधी के गुणगान का अवसर नहीं है। यह गांधी को उनकी संपूर्णता में पहचानने का और फिर हिम्मत हो तो उन्हें अंगीकार करने का वक्त है। हमने धर्मों के नाम पर, जातियों और वर्गों के नाम पर, खोखली रवायतों के नाम पर बहुत लड़ाइयां लड़ी हैं और फिर भी छूंछे-के-छूंछे ही रह गये हैं। आ खिर क्या हुआ कि तमाम विकास के बाद भी 72 सालों की आ जादी के हाथ इतने खाली हैं ? इसलिए कि हम गांधी का अंतिम आ दमी का जंतर भूल गये। चालाक सत्ता ने उसकी तरफ अपनी पीठ कर दी। आ जादी जब अपने सारे फलाफल के साथ अंतिम आ दमी तक नहीं पहुंचती है तो वह गिरोहों के छल-कपट में बदल जाती है। अंतिम आ दमी जिस आ जादी की डोरी पकड़ न सके, वह आ जादी कटे पतंग की तरह हवा में डोलती रहती है और उसे लूटने के लिए सारे शोहदे दौड़ लगाते रहते हैं। 150 साल के गांधी फिर से आ वाज लगाते हैं : मेरा जंतर याद करो, अंतिम आ दमी से जुड़ो !

हम आ जादी के ‘गांधी-मंत्र’ समझें और तंत्र को मजबूर करें कि वह अपनी दिशा बदले, तभी 150 साल पुराना संकल्प पूर्णता को प्राप्त होगा