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महेंद्र पाण्डेय | 18 FEBRUARY, 2018

मीडिया की ऐसी बदत्तर हालत कभी नहीं

महेंद्र पाण्डेय


द इकोनॉमिस्ट ग्रुप के संस्थान इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट द्वारा जनवरी के अंत में “डेमोक्रेसी इंडेक्स २०१७ फ्री स्पीच अंडर अटैक” प्रकाशित किया गया है. वर्ष २००६ से हरेक वर्ष डेमोक्रेसी इंडेक्स प्रकाशित किया जाता रहा है, पर इस साल एक अलग खंड में मीडिया फ्रीडम इंडेक्स भी प्रस्तुत है. प्रकाशकों के अनुसार इस इंडेक्स कि जरूरत इसलिए है क्योंकि आज के दौर में मीडिया की स्वतंत्रता अपने सबसे निचले स्तर पर है और दुनिया के हरेक क्षेत्र में स्वतंत्रता पर ग्रहण लग रहा है.

इस इंडेक्स में भारत का स्थान ४९ वा है, पर इसी स्थान पर २१ और देश भी हैं क्यों कि भारत समेत हरेक देश के ७ अंक हैं. दरअसल यह इंडेक्स ० से १० अंक के बीच है, जहाँ ९-१० अंक वाले देशों में मीडिया सर्वाधिक स्वतंत्र है. ७-८ अंक वाले देशों में मीडिया आंशिक स्वतंत्र है और इससे नीचे के अंक वाले देशों में मीडिया स्वतंत्र नहीं है. मीडिया का मतलब टीवी, प्रिंट और सोशल मीडिया तीनों ही हैं.

भारत का मीडिया आंशिक स्वतंत्र है. रिपोर्ट के अनुसार भारत में जाती, धर्म, वर्ण और कुछ मामलों में सरकार की आलोचना करने पर भी कैद हो जाती है, पत्रकारों पर खतरे बढ़े हैं और छत्तीसगढ़ और जम्मू और कश्मीर तो पत्रकारों के लिए बहुत खतरनाक हो गए हैं. सरकारें, मिलिट्री और तथाकथित दक्षिणवादी हिन्दू संगठन पत्रकारों के लिए खतरा उत्पन्न करते हैं.

मीडिया की आंशिक स्वतंत्रता का मतलब भी इंडेक्स में बताया गया है, मीडिया बहुआयामी तो है पर इसके बड़े हिस्से पर सरकार या कुछ औद्योगिक घरानों का कब्ज़ा है. सरकार या सरकार समर्थित दक्षिणपंथी संगठनों के विरुद्ध आवाज को दबा दिया जाता है, या कानून का सहारा लेकर कुचल दिया जाता है. इन्टरनेट या दूसरे सोशल मीडिया भी लगभग सरकारी नियंत्रण में हैं, इन्हें कई मौकों पर बंद भी कर दिया जाता है. वैसे भी मीडिया का आलम यह है कि झूठी ख़बरें गढ़ी जाती हैं, समाज पर असर डालने वाली खबरें लापता रहतीं हैं, विभिन्न संगठनों के लोग जिन्हें सरकार का संरक्षण प्राप्त है दिन भर मीडिया के सहारे लोगों के जान से मारने की धमकी देते हैं और देशभक्त बन जाते हैं, इनके या सरकार की नीतियों की आलोचना करनेवाले देशद्रोही करार दिए जाते हैं.

प्रेस की स्वतंत्रता सीमित है, कुछ जगहों पर समाचारपत्रों का प्रकाशन बंद कर दिया जाता है, सरकार अपनी मर्जी से सोशल मीडिया और इन्टरनेट का उपयोग नियंत्रित कर देती है, वर्ष २०१७ के दौरान कई जर्नलिस्ट की हत्या भी की गयी, अनेक दक्षिणवादी हिन्दू संगठन कभी गाय के नाम पर तो कभी मजहब या देशभक्ति के नाम पर सरे आम हत्या कर देते हैं.

इंडेक्स बताता है कि विश्व के कुल ३० देश, जहाँ ११ प्रतिशत आबादी बसती है, वहां मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र है. इसी तरह विश्व की ३४.२ प्रतिशत आबादी भारत समेत ४० देशों में रहती है और इन देशों में मीडिया आंशिक स्वतंत्र है. इंडेक्स में कुल ९७ देश ऐसे हैं जहाँ का मीडिया स्वतंत्र नहीं है.

पूरे १० अंक वाले देश, जहाँ मीडिया सर्वाधिक स्वतंत्र है १० हैं – ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, डेनमार्क, फ़िनलैंड, आइसलैंड, आयरलैंड, लक्सम्बर्ग, न्यूज़ीलैण्ड, स्वीडन और अमेरिका. इसी तरह ० अंक वाले १४ देश जहाँ मीडिया जरा भी स्वतंत्र नहीं है, हैं – अज़रबैजान, बेलारूस, चाइना, क्यूबा, गिनिया, एरिट्रिया, इथियोपिया, उत्तरी कोरिया, सऊदी अरब, सीरिया, ताजीकिस्तान, टर्की, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान.

रिपोर्ट में बताया गया है कि इन्टरनेट और सोशल मीडिया का यह दौर सही मायने में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सुनहरा दौर है, पर हालत यह है कि विश्व कि आधी से भी कम आबादी स्वतंत्र मीडिया का लाभ उठा पा रही है और दूसरी तरफ केवल तानाशाही में ही नहीं बल्कि लोकतन्त्रों में भी मीडिया पर या चुनिन्दा खबरों पर प्रतिबंध आम बात है.

रिपोर्टर्स विदाउट बैरियर्स नमक संस्था, जिसका मुख्यालय पेरिस में है, वर्ष २००२ से लगातार हरेक वर्ष “वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स” प्रकाशित करती है. वर्ष २०१७ के इंडेक्स में कुल १८० देशों की सूचि में भारत १३६वें स्थान पर था जो २०१६ की तुलना में तीन स्थान नीचे था. २०१७ के इंडेक्स में नेपाल और श्रीलंका भारत से ऊपर थे जबकि पाकिस्तान केवल तीन स्थान नीचे, यानि १३९वें स्थान पर था. सबसे ऊपर के पांच देश हैं – नोर्वे, स्वीडन, फ़िनलैंड, डेनमार्क और नेदरलैंड्स.
 

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