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महेंद्र पाण्डेय | 3 OCTOBER, 2018

‘चैंपियंस ऑफ़ द अर्थ’ का पुरस्कार देने वाला 668 दिनों में 529 दिन विदेशी दौरे पर रहा

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण की साख बेहद गिरी हालत में है


संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण ने भारत के प्रधानमंत्री और फ्रांस के राष्ट्रपति को अपने सबसे बड़े पुरस्कार से नवाजकर साबित कर दिया कि पर्यावरण से इस संस्था का कोई लेना देना नहीं है और अच्छे सम्बन्ध और फायदे के लिए कोई भी अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार किसी को भी मिल सकता है. संही जानते हैं कि हमारे देश में वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण से दुनिया में सबसे अधिक मौते होतीं हैं और सभी प्राकृतिक संसाधनों को पूंजीपतियों को सौपने की तैयारी चल रही है. दूसरी तरफ फ्रांस के पर्यावरण मंत्री ने हाल में ही यह कहते हुए इस्तीफ़ा दे दिया है कि राष्ट्रपति पर्यावरण पर कोई ध्यान नहीं देते.

वर्त्तमान में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण की स्वयं की साख निम्नतम स्तर पर है, और इसके अध्यक्ष पर तमाम आरोप लगे हुए हैं. हालत यहाँ तक पहुँच गयी है कि डेनमार्क, स्वीडन, नोर्वे और नीदरलैंड जैसे देश ने इसे आर्थिक मदद देना भी रोक दिया है. कुछ दिनों पहले ही संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण के अध्यक्ष एरिक सोल्हीम को संयुक्त राष्ट्र जनरल असेम्बली की बैठक छोड़कर नैरोबी स्थित अपने मुख्यालय लौटना पड़ा क्यों कि नैरोबी स्थित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण के मुख्यालय के कर्मचारी सोल्हीम का प्रखर विरोध कर रहे हैं. कर्मचारी सोल्हीम को तानाशाह और अपनी मनमानी करने वाला बताते हैं.

सोल्हीम की फ्रांस और भारत से नजदीकियां भी किसी से छुपी नहीं हैं. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण के कर्मचारियों के अनुसार सोल्हीन ने फ्रांस में एक अवैध मिनी सेक्रेटेरिएट खोल लिया है जिसमें कुछ बहुत वरिष्ठ अधिकारी भी नियुक्त कर दिए गए हैं. अनेक मौकों पर सोल्हीम ने किसी और देश की यात्रा के दौरान फ्रांस की अघोषित यात्रा भी की है. भारत के साथ नजदीकियों के लिए एक उदाहरण ही पर्याप्त है, हाल में द गार्डियन ने कम से कम चार बड़े समाचार सोल्हीम के बारे में प्रकाशित किये हैं और समाचार के साथ में प्रकाशित अधिकतर चित्र उनके भारत यात्रा के समय के हैं.

सोल्हीम और संयुक्त राष्ट्र का अघोषित भारत प्रेम पहले से ही जाहिर है – इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस की मुख्य गतिविधियाँ हमारे देश में ही आयोजित की गयी थीं. इसमें सोल्हीन भी मौजूद थे. उन्होंने इसे भव्य कार्यक्रम बताया और वर्ष २०२२ तक एक बार उपयोग करने वाले प्लास्टिक को पूरी तरह प्रतिबंधित करने वाले प्रधानमंत्री की घोषणा की बहोत तारीफ़ की. सोल्हीन की पर्यावरण के प्रति असंवेदनशीलता इसी तथ्य जाहिर होती है कि वे एक ऐसे देश के भव्य आयोजन की तारीफ़ कर रहे थे, जहाँ प्रदूषण से दुनिया में सबसे अधित लोग मरते हैं और जहाँ से वनवासियों को विस्थापित कर हरेक प्राकृतिक संसाधन का मालिकाना हक़ देने की पुरजोर कोशिश सरकार लगातार करती रहती है. असंवेदनशीलता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि विश्व पर्यावरण दिवस के कुछ समय पहले ही तूतीकोरीन में एक उद्योग से उत्पन्न लगातार प्रदूषण का विरोध करते 13 लोगों को पुलिस और उद्योग के सुरक्षाकर्मी गोलियों से मार दिया जाता है, फिर भी संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण के अध्यक्ष ने इसकी भर्त्सना के बदले देश के प्रधानमंत्री को पुरस्कार भी दे दिया .

वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण की विश्वनीयता निम्नतम स्तर पर है. इंटरनल ऑडिट में सोल्हीम पर गंभीर आरोप लगे हैं. सोल्हीन नोर्वे के हैं और हाल में ही नोर्वे की एक कंपनी को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण ने एक बड़ा प्रोजेक्ट स्वीकृत कर दिया. यहाँ तक तो सब ठीक था, पर प्रोजेक्ट स्वीकृत करने के अगले ही दिन सोल्हीन की पत्नी उस कंपनी की एक बड़ी अधिकारी नियुक्त कर दी गयीं. ऑडिट के समय अपने 668 दिन के कार्यकाल में 529 दिन सोल्हीन विदेशी दौरों पर रहे और इसमें कुल 488518 डॉलर का खर्च हुआ. ऑडिट के अनुसार, सोल्हीन ने अनेक बिल ऐसे जमा किये हैं जो बढ़ा कर बनाए गए हैं. अभी इन सब मुद्दों पर जांच चल रही है, पर अनेक देशों ने जांच पूरी होने तक आर्थिक मदद रोक दी है. इस समय दूनिया भर के पर्यावरणविद संयुक्त राष्ट्र की भर्त्सना कर रहे हैं और इसे अपने उद्देश्य से पूरी तरह भटका हुआ मानते है.

वर्तमान में भारत की पर्यावरण संरक्षण को लेकर कोई भी साख नहीं है, सभी सम्बंधित इंडेक्स में यह सबसे निचले स्तर पर है और तापमान बृद्धि पर तमाम दावों के बाद भी बड़े देशों में अकेला देश है जहाँ कार्बन उत्सर्जन बढ़ता जा रहा है. फ्रांस की हालत भी लगातार बिगड़ती जा रही है. भारत के प्रधानमंत्री और फ्रांस के राष्ट्रपति में एक समानता जरूर है – अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर गर्जना और बड़े दावे करना ।

न्यूज़ सरोवर


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