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विजय चावला | 3 JANUARY, 2019

अमेरीकी फौजों की वापसी के मतलब

एक बहुध्रुवीय विश्व की शुरुआत


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा सीरिया से समस्त अमेरिकी फ़ौजी टुकड़ी को और अफगानिस्तान से आधे अमेरिका के सैन्य दल को देश वापस बुला लेना, पुराने युग के अन्त और एक नये युग के प्राराम्भ होने का संकेत देते हैं.

यह बात ठीक ही है कि अफगानिस्तान से फौजों की आंशिक वापसी कुछ हदतक ल्तालिनाम की शर्तों के अनुसार हैं और उनसे शान्ति वार्ता करने की प्राथमिक शर्त भी. इसके बावजूद ट्रंप ने ईराक में भी फौजों से जाकर ऐसा ही सन्देश दिया है कि हम लोग यहां की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं ला सकते.

शासकीय प्रतिष्ठान और ट्रम्प में मतभेद

एक बात गौर करने की है कि अमेरिका के शासकीय प्रतिष्ठान ट्रंप के विरोध में रहे हैं और हैं. उनकी नीति थी कि रूस को सबक सिखाया जाय. लेकिन ट्रम्प इसके विरोध में रहे हैं. उनका निशाना चीन रहा है. वे विभिन देशों में फ़ौजी हस्तक्षेप के विरोध में रहे हैं. इसीलिए अमेरिका के शासकीय प्रतिष्ठान के अखबार और अन्य संस्थाएं निरंतर उनके विरोध में मुहिम चला रही हैं. इसके पीछे ट्रंप की नीतियों का विरोध है.ये प्रतिष्ठान हमलावार नीति जारे रखने के पक्ष में हैं . लेकिन इन सब विरोधों के बावजूद ट्रम्प अपनी नीतियों पर अडिग हैं.

वर्तमान युग

जहां तक युग - परिवर्तन की बात है, तो वर्तमान युग की शुरुआत वर्ष १९९० से मानी जाती है जब सोवियत संघ का विघटन हो गया और अमेरिका विश्व की एक मात्र महाशक्ति के रूप में रह गया. यह एक ऐसा मौका था जिसका इंतज़ार पश्चिमी पूंजीवादी देशों के शासकों को १९१७ से थी. जब से अक्टूबर क्रांति रूस में संपन्न हुई थी, तब ही से ये सभी देश इसे समाप्त करने की योजनायें बना रहे थे. यह कोई अतिशयोक्ती नहीं होंगी, यदि यह कहां जाय कि इन देशों की विदेश नीतियों का पूरे दौर में यही लक्ष्य रहा है कि किस प्रकार सोवियत संघ को समाप्त किया जाय ताकि पूरे विश्व में पुन: पश्चिम पूंजीवादी देशों का राज हो सके और अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को अपने मन मुताबिक़ रच सके.

दूसरे महायुद्ध के बाद की स्थिति

दूसरे महायुद्ध ख़त्म होने पर ऐसी परिस्तिथियां बन भी गई थी क्योंकि हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिराकर अमेरिका ने यह घोषणा कर दी थी कि वही दुनिया की निर्णायक शक्ति है और उसके पास परमाणु बम के रूप में ब्रह्मास्त्र है. लेकिन अमेरिका की यह घोषणा कुछ ही वर्षों तक ही चल सकी. वर्ष १९४९ में, सोवियत रूस ने भी परमाणु बम बना लिया था और अमेरिका से एक वर्ष पहली ही उसने हाईड्रोजन बम भी १९५१ में बना लिया . इस प्रकार, सोवियत संघ अमेरिका के विरोध में खड़ा हो गया.

इसके अलावा, अब रूस अकेला समाजवादी देश नहीं था. बल्कि दूसरे महायुद्ध के समापन के साथ ही पूर्वी यूरोप के तमाम देश भी समाजवादी निर्माण के काम में लग गये थे. वहाँ पर पूंजीवादी सत्तायें ख़तम कर दी गई थी और नयी राजसत्ताएं स्थापित कर ली गई थी. इन देशों की कम्यनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में वहां सरकार का निर्माण किया गया था.

इसी प्रकार, चीन में १९४९, उत्तरी वियेतनाम और उत्तरी कोरिया में वर्ष १९५४ में नयी राजसत्ताओं को स्थापित किया गया और कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में वहाँ पर सरकारों का गठन किया गया. इसलिए, अब सोवियत संघ अकेला नहीं था. दुनिया का छठवां हिस्सा समाजवादी हो चुका था. वर्ष १९५७ में रूस दुनिया का पहला देश बना जिसने एक क्रत्रिम उपग्रह छोड़ा. अमेरिका यह कार्य एक वर्ष बाद ही कर सका.

पिछड़े देशों का उत्थान

इस प्रकार, हम देखते हैं कि एक विश्वव्यापी संघर्ष शुरू हो गया. इस दौर में, कई देशों ने मिलकर एक स्वतंत्र गुट – जिसे गुट निरपक्ष कह गया – संगठित किया. वर्ष १९७३ में तेल निर्यातक देशों ने एक अपना संगठन बनाया और उन्होनें एक समझ के तहत पेट्रोलियम के मूल्यों मे वृद्धि की, जिससे वे कुछ ही वर्षों में पिछड़े देश से परिवर्तित होकर विकसित देश हो गए. इसके अलावा, कुछ राष्ट्रवादी देशों का उठान हुआ जिन्होंने अमेरिका और पश्चिम पूंजीवादी देशों को सीधे राजनैतिक चुनौती देनी शुरू कर दी. इनमें लीबिया के मुनाम्मर गद्दाफी, ईराक के सद्दाम हुसैन, ईरान का इस्लामिक राज्य इत्यादि थे. इस प्रकार, जो काल अमेरिका की शताब्दी के रूप में जाना जाना था वह सपना वियतनाम की लड़ाई में ख़तम हो गया, जहां से अमेरिका को जान बचाकर भाग जाना पड़ा.

विश्व व्यापार संगठन की स्थापना

इन हार के बावजूद, अमेरिका ने १९८० के दशक में एक बार फिर वापसी की कोशीश की. यह कार्य उसने विश्व व्यापार संगठन की नींव रख कर किया. १९८६ में व्यापार और तटकर पर सामान्य समझौता ( जी ए टी टी) के तहत अमेरिका ने अपना वैश्विक आर्थिक आधिपत्य स्थापित करने के लिए इसके दायरे को केवल व्यापर से बढ़ा कर, विरोध के बावजूद, अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों को इसमें शामिल कर लिया. मुख्य लक्ष्य हासिल यह किया गया कि वस्तओं और पूंजी के बेरोकटोक की आवाजाही स्वीकार करा ली गयी. अर्थात अब विकासशील देश अपना विकास करने के लिए, उद्योग धंधे से स्थापित करने के लिए, विदेशी साजो - सामान के आयत पर रोक लगाते थे, वह रास्ता बंद कर दिया गया. अब माल के आयात पर रोक लगाना, घरेलू और आयातित माल में फर्क करना, आम सहमति से समाप्त कर दिया गया. इस तरीके से ही भारत जैसे तमाम देशों ने अपना औद्योगिक आधार बनाया था. लेकिन अब यह मार्ग बंदकर दिया गया.

इस प्रकार, पूंजी के निवेश पर भी रोक समाप्त कर दी गयी. देशी और विदेशी पूंजी में देशी को वरीयता देने वाले नीति को भी छोड़ना पड़ा. वर्ष १९९१ तक आते आते यह साफ हो गया था कि अधिकांश देशों द्वारा नए अमेरिकी आर्थिक अभियान, जिसकी परिणति वर्ष १९९४ में विश्व व्यापार संगठन के निर्माण के रूप में हुई, का विरोध समाप्त सा हो गया. इसका मुख्य कारण था सोवियत संघ का टूटना. इनमें से अधिकांश देश अमेरिका और रूस की प्रतिस्पर्धा का लाभ उठाकर ही स्वायात तरीके से अपनी राजनैतिक अभिव्यक्ति कर पाते थे. लेकिन सोवियत संघ के टूटने और उसके वैश्विक प्रभाव के कम होने से, इन देशों का स्वावलंबी विकास का प्रयास अधूरा रह गया. इनमें इतनी शक्ति नहीं थी कि वे अमेरिका के समक्ष बिना सोवियत संघ के समर्थन के खड़े हो सके .

इसके साथ ही वह युग, जिसकी शुरुआत दूसरे महायुद्ध के समापन के साथ १९४५ में शुरू हुई थी, उसका अंत वर्ष १९९० में हो गया और एक नए युग का प्रारम्भ हुआ.

सोवियत संघ के टूटने के परिणाम

सोवियत संघ के टूटने के साथ ही, अमेरिका और इंग्लैंड का खेमा अत्यन्त आत्मविश्वास से भर उठा. उनके सामने एक एसा मौका आया था जिसका उन्हें लम्बे समय से इंतज़ार था.

इस मौके की उन्हें ७३ साल से आस थी और वह मौका आ गया था. वे दुनिया पर एकछत्र राज चाहते थे. यहां तक कि इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर ने यह घोषणा की कि अब हमारी फौजें जहां भी जायेंगी, वहां से वे वापस नहीं आयेंगी. अमेरिका तो इस हद तक आश्वस्त था कि उसे यह लग रहा था कि अब उसे यूरोप के साझीदारों की ज़रुरत नहीं है. अमेरिका ने यूरोप से सलाह मशविरा करना भी बंद कर रखा था. केवल ब्रिटेन ही उसके साथ था. बाकी किसी को लेने की उसे ज़रूरत भी महसूस नहीं हो रही थी.

अमेरिका के फौजी अभियान

अमेरिका तमाम टेक्नोलोजी के क्षेत्रों में जापान से पिछड़ चुका था. आगे बढ़ने के लिए उसने फ़ौजी अभियानों का सहारा लिया. और वह भी उन देशों के खिलाफ, जो उसके विरोध में स्वावलंबी विकास की ओर अग्रसर थे. शुरुआत ईराक से की गई जहां सद्दाम हुसैन अमेरिका की चालों में फंस गया और कुवैत पर हमला कर दिया. अमेरिका के लिए यह काफी था और उसने यह बहाना बनाकर ईराक पर हमला कर दिया. और उसके बाद से हमलों का सिलसिला जारी हो गया. १९९० के दशक में युगोस्लाविया को समाप्त कर दिया गया. उसके चार टुकड़े कर दिए गये. इसी प्रकार यूरोपीय पूंजीवादी देशों और अमेरिका, कुछ मतभेदों के बावजूद, साथ - साथ आ गए. इस प्रक्रिया में दूसरे महायुद्ध के समय जो प्रभाव क्षेत्रों का बंटवारा याल्टा में सोवियत संघ ब्रिटेन और अमेरिका के नेताओं में किया गया था जिसमें अलग - अलग प्रभाव क्षेत्र चिन्हित किये गये थे, उसको पश्चिम देशों ने तोड़ दिया और समूचे पूर्वी यूरोप को अपने प्रभाव क्षेत्रों में ले लिया और इसके कई देश नाटो के सदस्य भी बन गए थे.

9 / 11 के परिणाम

9/11 2001 ने अमेरिका के हमलावर नीति को और अधिक बल प्रदान किया . इससे पहले ही अमेरिका ने सात देशों में सत्ता परिवर्तन की योजना बना ली थी .ये देश थे - ईराक, इरान, सीरिया, लीबिया, सूडान, उत्तरी कोरिया और अफगानिस्तान. ये सभी अमेरिका की नज़र में बदमाश राज्य थे, जिन्हें ठीक करना ज़रूरी था. ताकि अमेरिका और पश्चम युरोप के पूंजीवादी देश दुनिया का संचालन अपने मन मुताबिक़ कर सके. 9/11 के एक महीने बाद से ही अमेरिका अफगानिस्तान पर हमला कर दिया और तब से अब तक समूचा विश्व अमेरिका की हमलावर नीतियों से थर्र्रा रहां है . वर्ष २००१ मे अफगानिस्तान, २००३ में ईराक, उसके बाद में

लीबिया, यह तीन नष्ट हो चुके हैं .लीबिया के गद्दाफी को रेगिस्तान की बालू पर घसीट - घसीट कर मारा गया था. पूरा देश आजतक अराजकता में डूबा हुआ है .सूडान में गृहयुद्ध में वृद्धि की गई और यह देश आज दो हिस्सों में बंट गया है. एक है दक्षिण सूडान और दूसरा है सूडान. उसका पहले का साम्राज्यवाद विरोधी रुख अब समाप्त हो चुका है. इरान के साथ ओबामा के कार्यकाल में समझौता किया गया था. इरान के साथ यूरोप महाद्वीप के ब्रिटेन, फ़्रांस, और जर्मनी खड़े थे और हैं . लेकिन ट्रंप ने उसे रद्द करने के घोषण कर दी है . यूरोप के साम्राज्यवादी देशों ने उसका साथ नहीं दिया हैं, लेकिन अमेरिका ने भी कोई हमलावर कदम नहीं उठाये हैं और यथास्थिति बनी हुई है . रूस के व्लादिमर पुतिन ने उस समय यह घोषणा कर दी कि यदि इरान ने हमला किया तो वह तटस्थ ही रहेगा. लेकिन यदि इरान पर हमला किया गया तो वह इरान के साथ है.

सीरिया

जहां तक सीरिया का सवाल है, ओबामा के राष्ट्रपति के दौर में लीबिया को समाप्त करने के बाद ओबामा पर यह दबाव दिया गया कि वह सीरिया पर हमला करे और एक समय ऐसा लग रहा था कि अमेरिका का हमला हो ही जायेगा. लेकिन ठीक इस समय रूस ने अमेरिका की चुनौती का मुकाबला करने की नीति अपनाई. और पुतिन ने यह साफ कर दिया दिया कि रूस सीरिया को नीचे नही जाने देगा. और यहां से अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों का हमलावार अभियान को थाम लिया गया . रूस ने चार देशों के नष्ट होने के बाद ही रोक लगाई . लेकिन एक बार उसने रोक लगा दी तो अमेरिका का विजयी रथ वही रुक गया. यह एक युग परिवर्तन वाली घटना थी.

उत्तर कोरिया

आखिर में उत्तर कोरिया इसलिए बच सका क्योंकि उसने वह गलती नहीं की जो सददाम हुसैन और गद्दाफी ने की थी. इन दोनों ने अपने जन - संहारक हथियारों को नष्ट इस आशा से कर दिया था की ऐसा करने पर अमेरिका इन पर हमला नहीं करेगा और अमेरिका की मांगें यहीं तक सीमित हैं . वे यह भूल गए कि अमेरिका सभी राष्ट्रवादी देशों के खिलाफ है क्योंकि वे उसके साम्राज्यवादी विस्तार में आड़े आते हैं. लेकिन उत्तर कोरिया ने ऐसा नहीं किया. उसने हर धमकी के साथ अपने परमाणु बम का परीक्षण किया. वह अपने हथियारों का जखीरा बढाता रहा. हर धमकी का जवाब अपनी धमकी से दिया. किसी में यह साहस नहीं था उसके धमकी का परीक्षण करे. अंत में, अमेरिका को उत्तर कोरिया के शासक से बातचीत करनी पड़ी. पूर्वी एशिया में शान्ति स्थापित है.

इस प्रकार, अमेरिकी साम्राज्यवाद का आगे बढना रोक दिया गया है. इन पूरे फौजी अभियानों में एक अनुमान के अनुसार अमेरिका ने 7 लाख करोड़ डॉलर खर्च किये हैं. और आज यह स्थिति है कि वह किसी भी स्थान पर अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकता. सीरिया में वह निर्णायक ताकत नहीं है. असली सत्ता रूस और सीरिया के हाथ में है. ईराक नष्ट हो चुका है. अमेरिका अब उसे बहुत अधिक दुहने की स्थिति में नहीं है, लीबिया नष्ट हो चुका है, लेकिन इसका असली लाभ फ़्रांस/ब्रिटेन और यूरोप को जा रहा है. इरान को नष्ट करना आसान नहीं है. प्रतिबन्ध लगाने के बाद भी बहुतेरे देशों और अमेरिका को उसे व्यापार करने की छूट देनी पड़ी है. आर्थिक रूप से अमेरिका चीन के खिलाफ खड़ा नहीं हो पा रहा है. फ़ौज के द्वारा अपना आधिपत्य स्थापित करने की एक सीमा है और वह उस सीमा तक पहुँच गया है. अफगानिस्तान में वह अब शान्ति चाहता है. वहां उसकी हार हो चुकी है. हमीद करज़ई की माने तो अब जो भी आफ्गानिस्तान में विस्फोट हो रहे हैं वह इस्लामिक स्टेट ही कर रहा है और इसके पीछे अमेरिका है. अमेरिका ने ही आई एस को जन्म दिया था. प्रारम्भिक दिनों में उसकी रक्षा की थी.

अफगानिस्तान से आधे फौजियों को वापस बुलाने का मतलब है कि तालिबान की इस मांग को आंशिक रूप से मान लिया गया है कि बातचीत शुरू होने से पूर्व विदेशी फौजें अफगानिस्तान छोडें.

नवीनतम युग का प्रारम्भ

कुल मिलाकर, स्थिति इस प्रकार है कि अमेरिका को यह साफ हो गया कि उसका फ़ौजी अभियान का दौर अब समापन पर है और उससे न तो अधिक लाभ ही होने वाला है और न ही इससे अधिक संभव ही है. क्योंकि रूस और चीन दोनों ने ही उसका रास्ता रोक लिया है. अब उसे यदि प्रगति करनी है तो आर्थिक तौर पर उसे चीन, जापान और कुछ हद तक भारत का मुकाबला करना पडेगा. डोनाल्ड ट्रंप आज इसी काम में लग गए हैं. और कुछ उन्हें सफलता मिलनी भी शुरू हो गई है.

इस प्रकार, एक युग का अंत हो रहा है और यह एक नए युग की शुरुआत है. इसमें आर्थिक प्रतिद्वंदिता पर अधिक जोर होगा. वह दौर, जिसमें अमेरिका निरंकुश तरीके से दुनिया में बढ़ रह था और आधिपत्य स्थापित कर रह था, उसका अंत हो गया है.

यह बात सही है की ट्रंप की इस नीति का अमेरिका के शासक वर्गों की ओर से जबरदस्त विरोध शुरू हुआ है. उनके रक्षा मंत्री जोर्ज मैटीस ने त्यागपत्र दे दिया है. इसी प्रकार, इजराइल ने भी विरोध किया है. फ़्रांस के राष्ट्रपति मकरोंन भी ट्रंप की इस नीति के विरोध में खड़े हुए हैं. उनका कहना है कि इससे जिन लोगों ने, जैसे कुर्दों ने अमेरिका के साथ लड़कर इस्लामिक स्टेट को रोका है, वे बिलकुल अलग थलग पड़ जाएंगे. ट्रम्प की यह दलील कि चूंकि इस्लामिक स्टेट समाप्त हो गया है, इसलिए अमेरिका वहाँ से वापस आ रहा है, को चुनौती दी गई है. और यह कह गया है कि अभी इस्लामिक स्टेट जिन्दा है और उसके हज़ारों लड़ाके सीरिया और ईराक में फैले हुए हैं. इस बात को तो ट्रंप भी जानते हैं. तो यह नीति क्यों?

आमेरिका के चले वाने पर वहां की स्थिति को रूस, सीरिया के शासक असद इत्यादि को बचे खुचे लड़ाकों को निपटाना पड़ेगा. इसी प्रकार, इरान को ईराक और सीरिया में भी इनसे जूझना पडेगा. अमेरिका साफ बच जायेगा. उधर, इजराइल को भी मुस्तैद रहना पडेगा . वह लगातार यह आरोप लगा रह है कि ट्रंप के इस कदम से केवल रूस को लाभ है. अमेरिका ने भी यह घोषणा की है कि वह अपने प्रतिनिधि तुर्की और इजराएल भेजेगा और अमेरीकी फौजों की वापसी के बाद कैसे स्थिति को संभालना है उस पर चर्चा करेगा.

एक ओर तो स्थान छोड़ने के बाद भी अमेरिका चौकस रहेगा और दूसरी ओर वह यह आशा करेगा कि उसके मित्र राष्ट्र इस समस्या से निपटे. जो हो, अमेरिका के सीधे प्रभाव में कमी आयेगी. नयी परिस्तिथियों में प्रत्येक मौजूद शक्तियों ने नये सिरे से व्यूह रचना शुरू कर दी है. यह एक बहुध्रुवीय विश्व हो गया है. और वर्ष 1990 में शुरू हुए काल खंड का अन्त हो गया है.
 

न्यूज़ सरोवर


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