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महेंद्र पाण्डेय | 16 NOVEMBER, 2018

महिलायें भी महिला राजनीतिज्ञों पर भरोसा नहीं करतीं

महिलायें भी महिला राजनीतिज्ञों पर भरोसा नहीं करतीं


पिछले सप्ताह के अंत में जर्मनी की चांसलर अंजेला मार्केल ने महिलाओं के सशक्तीकरण की वकालत करते हुए कहा कि दुनिया भर में राजनीति, व्यापार, विज्ञान और संस्कृति में महिलाओं की भागीदारी बढ़नी चाहिए. मार्केल के अनुसार वे जर्मनी में सबसे ऊंचे पद पर हैं, इसका मतलब यह नहीं कि महिलायें बहुत आगे बढ़ गयी हैं. महिलाओं को हरेक जगह बराबरी का दर्जा पाने के लिए प्रयासरत रहने की आवश्यकता है. इस समय जर्मनी के संसद में कुल 30.9 प्रतिशत महिलाएं हैं, पर इन आंकड़ों पर इतराने की जरूरत नहीं है क्यों कि अत्यधिक पिछड़े देश सूडान की संसद में भी महिलाओं का प्रतिशत इतना ही है. मार्केल जर्मनी के इतिहास में चांसलर के पद तक पहुँचाने वाली एकलौती महिला हैं.

अमेरिका में वर्तमान में कोंग्रेस में महिलाओं की संख्या पिछले सभी समय की तुलना में सर्वोच्च है, पर वहाँ की सभी बड़ी लिस्टेड कंपनी में से केवल दो में महिलायें सर्वोच्च पद पर हैं. जर्मनी में बड़ी कंपनियों में से 18 प्रतिशत का स्वामित्व महिलाओं के अधीन है. कुछ दिनों पहले बांग्लादेश की राजधानी ढाका में अवामी लीग समेत अनेक राजनैतिक दलों के 50 महिला प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया. इसमें कहा गया कि लगभग सभी राजनैतिक दल महिलाओं को केवल महिला ही समझते हैं, इंसान नहीं.

वर्तमान दौर में जब दुनियाभर में महिलायें कम से कम राजनीति में आगे बढ़ रही हैं, एक नया अध्ययन यह बताता है कि महिलायें भी महिला राजनीतिज्ञों पर भरोसा नहीं करतीं. जर्मनी के जर्नल ‘सेक्स रोल्स’ के नवीनतम अंक में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार अधिकतर पुरुष ही नहीं बल्कि महिलायें भी महिला राजनीतिज्ञों पर भरोसा नहीं करतीं. इस शोधपत्र के अनुसार जब लोगों से इस बारे में सीधे प्रश्न किया जाता है तब उनका जवाब अलग होता है और यदि यही प्रश्न उन्हें यह विश्वास दिलाकर किया जाता है कि उनकी पहचान गुप्त रहेगी तब लोग अलग जवाब देतें हैं. ऐसा शायद इसलिए है, सीधे प्रश्न का जवाब देते समय लोग मन की बात नहीं बल्कि और लोगों की राय के अनुसार अपनी राय रखते हैं.

इस अध्ययन को जर्मनी के हेनरिच हेन यूनिवर्सिटी के समाज विज्ञान विभाग की विशेषज्ञ एड्रियन होफमैन और जोशें मुस्च ने 1529 लोगों से साक्षात्कार के आधार पर किया है. जब लोगों से सीधे सवाल किया गया तब 23 प्रतिशत लोगों ने महिलाओं को राजनीति के लिए अयोग्य करार दिया. फिर जब उन्हें पहचान गोपनीय रखने का आश्वासन दिया गया तब महिला राजनीतिज्ञों पर भरोसा नहीं करने वालों की संख्या 37 प्रतिशत तक पहुँच गयी. सीधे साक्षात्कार के समय केवल 10 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि महिलायें राजनीति में आने लायक नहीं हैं, पर पहचान गोपनीय रखने के आश्वासन के बाद उनकी संख्या बढ़कर 28 प्रतिशत तक पहुँच गयी. जबकि पुरुषों में यह संख्या 36 प्रतिशत से बढ़कर 45 प्रतिशत तक पहुँच गयी. इसका सीधा सा मतलब है कि एक-चौथाई से अधिक महिलायें भी नहीं मानतीं कि महिलाएं राजनीति में आने लायक हैं, जबकि लगभग आधे पुरुष महिलाओं को राजनीति के लिए सक्षम नहीं मानते.

हमारे देश में महिलाओं की हालत और भी खराब है, जाहिर है राजनीति में भी इसका असर पड़ता है. यह सब तब है, जब राष्ट्रपति महिला रह चुकी हैं, प्रधानमंत्री महिला रह चुकी हैं. पर राजनीति में अभी तक महिलाओं की भागेदारी बहुत कम है. लगातार महिलाओं की राजनीति में 50 प्रतिशत भागीदारी की चर्चा के बीच सोलहवीं लोक सभा में कुल 543 सांसदों में से महज 62 महिलायें हैं.

हमारे देश में महिलाओं की स्थिति का आईना तो यूएनडीपी का जेंडर असमानता इंडेक्स है. वर्ष 2018 में कुल 160 देशों में हमारा स्थान 127वां था. लडकी बढ़ाओ, लडकी पढाओ के नारे बुलंद होते रहे और हम इस इंडेक्स में लुढ़कते रहे. वर्ष 2017 में हम 125वें स्थान पर थे. यह इंडेक्स देशों में महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य, राजनीति और शिक्षा में महिला सशक्तीकरण और आर्थिक भागीदारी के आधार पर तैयार किया जाता है. इंडेक्स के अनुसार भारत की स्थिति इस मामले में बहुत खराब है, संसद में केवल 11.6 प्रतिशत हिस्सेदारी महिलाओं की है, 39 प्रतिशत से भी कम महिलायें माध्यमिक शिक्षा प्राप्त कर पाती हैं और आर्थिक भागेदारी मात्र 27.2 प्रतिशत है.

इतना तो स्पष्ट है कि महिला सशक्तिकरण की राह आसान नहीं है, केवल पुरुषों के विचारों में ही आमूल परिवर्तन की जरूरत ही नहीं है, बल्कि महिलाओं को भी अपने विचार बदलने पड़ेंगे. महिलाओं को समझना पड़ेगा कि वे केवल महिला ही नहीं हैं, बल्कि इंसान हैं.

न्यूज़ सरोवर


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